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Saturday, November 30, 2019


फ्रेंच कहानी

मैग्नोलिया का फूल
 
आंद्रे शाम्सों

अनुवाद : मंगलमूर्त्ति

माँ की जो सहेली उस साल उससे मिलने आई थी उसे मैंने पहली बार देखा था | माँ कहती थी वह उसके साथ कॉलेज में पढ़ी थी और फ्रेंच होते हुए भी अंग्रेजी इतनी सहजता से बोलती थी कि अक्सर फ्रेंच बोलने में भी अंग्रेजी लहजा झलक जाता था | उसकी उम्र माँ जितनी ही रही होगी | उसके साथ उसकी एक लड़की भी थी जो मुझसे कुछ बड़ी तो होगी, पर अभी बिलकुल जवान नहीं हुई थी | लेकिन शोख तो इतनी कि आते ही मुझसे दोस्ती हो गयी | रंग उसका खूब गोरा था और कद भी लम्बा, छरहरा | और शरीर इतनी कि कस कर मेरा हाथ पकड़ लेती और तेजी से दौडाते हुए मुझको खेतों की ओर लिए चली जाती | नदी के किनारे हेज़ेल की झाड़ियों तक पहुँचते-पहुँचते मेरी सांस बिलकुल फूल जाती | लेकिन उसके अन्दर लगता जैसे सहसा कोई आंधी उठ आई हो और उसके होंठ भी हलकी चिकनाहट से भींग जाते | एक अजीब अल्हड़पन से भरी वह वहीँ झाड़ियों के पास गिर जाती, और एक झटके से मुझको भी खींच कर अपने पास गिरा लेती | फिर हाँफते-हाँफते ही मेरे हाथ खींच कर अपने गालों से सटाती, और फिर धीरे-धीरे न जाने कब उन्हें अपने फ्रॉक में भी डाल लेती | तब फिर सहसा एक लापरवाह अदा से अपना सिर झटकती और खिल-खिला कर हंसने लगती  | और मैं तो शर्म से एकदम काठ हो जाता – मेरे हाथ जहाँ होते, बस वहीँ जैसे चिपके रह जाते | 

लेकिन मुझको इस तरह का खेल बिलकुल पसंद नहीं था, और उसकी इन हरकतों से मैं बिलकुल चिढ जाता | हालांकि मैं यदि थोडा भी ताकत आजमाता तो उसको वहीँ दबोच देता, लेकिन वैसी चुलबुली लड़की से मैं लड़ता भी तो कैसे | वह गुस्से से एकाएक मेरा हाथ दूर झटक देती और अपनी तनी आँखों से मुझको घूरने लगती | लेकिन फिर दूसरे ही क्षण वही झरने-वाली खिलखिलाहट. वही खींच-तान, वही भाग-दौड़ |

उसकी इन अजीब आदतों से कुछ ही दिनों में मुझको उससे बहुत चिढ-सी हो गयी, और मैं उससे दूर-दूर रहने लगा | यहाँ तक कि उससे बचने के लिए अक्सर मैं किसी पेड़ पर चढ़ कर छिप जाता | लेकिन न जाने कैसे वह जान जाती, और पेड़ों पर भी मेरा पीछा नहीं छोडती | एक दिन मैं अहाते में एक मैग्नोलिया के ऊँचे पेड़ पर चढ़ कर छुप गया | मैग्नोलिया का वह पेड़ बिजली के खम्भे की तरह सपाट सीधा और चिकना था | और काफी ऊंचा भी था | उसकी डालें भी सब अलग-अलग छितराई हुई-सी थीं | मैंने सोचा यहाँ वह कभी पहुँच नहीं पायेगी | धीरे-धीरे मैं उस पेड़ की आखिरी लचीली डाल पर जा बैठा, जहाँ से आस-पास के ऊंचे-ऊंचे मकानों की छतें भी नीचे दीख रही थीं |

मैग्नोलिया की उस डाल पर मैं बड़े आराम से पेड़ के तने से लग कर बैठ गया | चारों ओर सब कुछ बिलकुल शांत लग रहा था | हवा के नर्म झोंके पूरे बदन को जैसे प्यार से सहला जाते थे और एक ताज़गी से भर दे रहे थे | छिप कर इस तरह बैठने में मुझे बहुत ख़ुशी हो रही थी | ऊपर आसमान के कुछ नीले-हरे टुकड़े मैग्नोलिया के फूलों में उलझ-सुलझ रहे थे | तभी नीचे से किसी के हांफने की आवाज़ मिली | झुक कर नीचे देखने की कोशिश में मैं गिरते-गिरते बचा |
नीचे फिर वही लड़की थी जो अब धीरे-धीरे इसी पेड़ पर ऊपर चढ़ती आ रही थी | पेड़ के चिकने काले तने को अपनी दोनों जाँघों से दबाये हुए वह धीरे-धीरे ऊपर सरकती चली आ रही थी, और देखते-देखते वह मेरे  बहुत करीब आ गयी थी | एक-एक डाल को पकड़ती हुई वह बड़ी मुश्किल से ऊपर चढ़ पा रही थी | उसके स्कर्ट की सलवटें इसमें चूर-चूर हो रही थीं, और शायद पेड़ की खुरदरी खाल की रगड़ से उसका चमडा भी छिल चुका था | लेकिन फिर भी वह जिद्दी लड़की हांफती-चढ़ती धीरे-धीरे ऊपर बढती आ रही थी | मैं मन में हंसा – खैर, इस बार उसे अच्छी सीख मिल जाएगी | लेकिन तब तक तो वह मेरी डाल के बिलकुल पास पहुँच चुकी थी |

-       देखना, मैग्नोलिया की ये डालें बहुत नाज़ुक होती हैं |

-       मुझे भी अपने पास चढ़ा लो नहीं तो मैं गिर जाऊंगी |

-       लेकिन दो यहाँ कैसे बैठ सकेंगे ?

-       अरे, मैं तुम्हारी गोद में बैठ जाऊंगी !

-       वाह, हम दोनों का भार संभालेगी ये डाल?

-       कोई बात नहीं, गिरेंगे भी तो साथ ही न ?

-       पागल हो गयी हो ! इस तरह स्कर्ट पहने हुए तुम मेरी गोद में बैठोगी भला कैसे | जांघें तो तुम्हारी बिलकुल खुली हुई हैं |

-       कोई नहीं, तुम्हारी कौन-सी नहीं खुली हैं !

कहती हुई वह ऊपर आ गयी और मेरी बगल में चढ़ आई | आज भी वह उसी तरह हांफ रही थी जैसे उस दिन हांफ रही थी - नदी किनारे, हेज़ल झाड़ियों के पास | उसका मुहं बिलकुल मेरे मुहं के पास था, और मैंने देखा उसकी आँखों में एक हरियाली की अजीब-सी चमक थी | उसकी गर्दन कबूतरों की गर्दन जैसी कोमल और मुलायम थी | आहिस्ता-आहिस्ता वह मेरी गोद में सरक आई थी, और उसकी पीठ मेरी छाती से एकदम सट रही थी | उसके दोनों पैर मेरे पैरों के ऊपर से होकर डाल की दोनों ओर झूल रहे थे | धीरे-से उसने अपना रेशमी बालों वाला माथा मेरे बांये कंधे पर टिका लिया, जिससे उसके गर्म, मुलायम गाल मेरे बांये गाल से सट गए थे |

-       अब तो तुम बिलकुल ठीक हो ना ? – उसने आंखें नचाते हुए पूछा | मैंने अपने पैन्ट को घुटने तक खींचने की कोशिश करते हुए झुंझला कर जोर से कहा – नहीं !

-       निरे उल्लू हो तुम ! – उसने शैतानी से अपना बोझ मुझ पर और निढालते हुए कहा |

-       उतरने दो मुझे !

-       तुम मुझको अपनी बांहों में लेकर उतरो, मैं कुछ नहीं कहूँगी |

-       मरने का इरादा है क्या ? – मैं और झुंझलाया |

-       मैं तुम्हारी ओर घूम कर बैठ जाती हूँ – और तब मेरे कान में धीरे-से फुसफुसा कर बोली – जानते हो मैं घूम कर बैठ जाऊंगी तो...

मेरी चुप्पी को शायद उसने मेरी हामी समझा, और ज्योंही घूम कर बैठने के लिए मुझसे थोडा अलग हुई, मैं जल्दी से उस डाल से नीचे खिसक आया और एक सर्राटे में पेड़ से नीचे उतर गया | फिर जब ऊपर देखा तो बीस-पच्चीस फीट ऊपर पेड़ के तने से लगी वह उसी तरह आराम से बैठी खिलखिला रही थी -  मैग्नोलिया की उन शोख डालियों की ही तरह जो उसके ऊपर हवा में इधर-से-उधर झूम रहीं थीं |

बीच में कुछ दिन तक परीक्षा के कारण उससे मेरी जान बची | माँ और उसकी सहेली की गंभीरता-भरी बातों के बीच मैं उस शोख लड़की को एक तरह से भूल ही गया था | हालांकि न जाने क्यों, माँ की सहेली के पाँव मुझे बहुत अच्छे  लगते थे | लेकिन जब भी मैं उन्हें देखता, मुझे अपनी माँ के पाँव याद आ जाते, और न जाने क्यों लगता मेरे मन में कोई पाप घुस आया हो | एक दिन झटके से किवाड़ की फांक से मैंने माँ की सहेली के पाँव घुटनों तक नंगे देख लिए, और उसी एक क्षण में उसके साए के भीतर की  झालर तक दीख गई | माँ ने एक दिन मुझसे कहा था की उसकी सहेली अपने पति को तलाक देना चाहती है | माँ ने यह भी कहा कि उसके बाद उसकी ज़िन्दगी पूरी तरह बदल जाएगी | लेकिन इन बातों को सुनने से मेरा मन अजीब हो जाता था | मुझको लगता इन गन्दी, फालतू बातों का असर कहीं मेरे परीक्षा-फल पर न पड़े | इस तरह की बेकार बातों को जान कर मैं भला परीक्षा के सवालों की तैयारी कैसे पूरी करता? इनसे तो मेरे दिमाग में हमेशा इसी तरह की गन्दी बातें चक्कर काटती रहतीं |

लेकिन आखिर इस तरह की बातों से अपने को पूरी तरह अलग करके मैं जोर-शोर से परीक्षा की तैयारी में लग गया | परीक्षा के दिन मेरा दिमाग पूरी तरह अपनी पढ़ाई के सवाल-जवाब से भरा हुआ था – सायों, घुटनों या जाँघों की तस्वीरें उसमें से मिट चुकी थीं | उस दिन पहले से ही मैंने अपनी पेंसिल की नोक भी  तराश कर नुकीली बना ली थी, और कलम में भी स्याही पूरी भर ली थी | सौभाग्य से परीक्षा में सवाल भी सब वही पूछे गए थे, जिन पर मेरी तैयारी पूरी थी | आखिर परीक्षा ख़तम हुई, और    कुछ घंटे बाद ही शिक्षकों के कमरे से बाहर आकर हेड मास्टर साहेब ने परीक्षा-फल सुना दिया – मैं पास था | थोड़ी ही देर बाद इंस्पेक्टर साहेब के रोबदार दस्तखत से सजा हुआ मेरा सर्टिफिकेट भी मुझको मिल गया |

हवा से होड़ लगाता दौड़ता-भागता मैं घर पहुंचा, तो गेट पर ही खड़ी मिली वही लड़की – मेरी दुश्मन, जो झाड़ियों और पेड़ों तक मुझे  खदेड़ती फिरती थी |

-       मैं पास कर गया | - मैंने हँसते हुए कहा |

-       अच्छा, चलो इस बला से तुम्हारा पल्ला तो छूटा | लेकिन अब तुम इसी वक्त से इसे बिलकुल भूल जाओ |

लत्तरों के उस महकते कुञ्ज की ओर देखते हुए उसने फिर एक बार धीरे-से मेरा हाथ दबाते हुए मेरी ओर देखा | आज फिर उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में हरियाली की वही चमक मौजूद थी | धीरे-से मुझसे बोली – उधर चलो न !

-       किधर ?

-       यहीं, यहीं !

-       यहाँ तो हम हैं ही | - मैंने अपना हाथ झटकना चाहा, लेकिन मेरे हाथ में जैसे कोई जोर ही न रह गया हो | आज फिर उसी दिन की तरह उसका मुहं मेरे मुंह के बिलकुल पास था, और उसकी आँखों की हरियाली और गहरी  हो गई थी |
-       कितने बुद्धू हो तुम ! मुझको चूम भी नहीं सकते?

सहसा न जाने क्यों मुझको लगा कि यह वही पहले वाली अल्हड लड़की नहीं थी जो मुझको खेतों की ओर खींच कर भगा ले जाती थी, और झाड़ियों के पास पहुँच कर, इठला कर गिर जाती थी, मुझको साथ लिए-दिए | वही लड़की – पेड़ों पर चढ़ती, मेरा पीछा करती, और मेरी गोद में ज़बरदस्ती आ बैठने वाली लड़की | आज वह अचानक कितनी गंभीर लग रही थी | हवा जैसे हमारी बातें सुनने के लिए वहां थोड़ी देर ठहर गई थी | और चारों-ओर फैले लत्तरों की खुशबू जैसे उसके बदन की खुशबू बन गई थी  – जिसमें एक ज़हरीला तीखापन-सा आ गया था |

-       चूमोगे नहीं मुझे ? -  पैर पटकते हुए वह झुंझला कर बोली |

-       नहीं, नहीं, मुझको यह सर्टिफिकेट पहले अपनी माँ को दिखाना है | तुम्हारी माँ को भी दिखाऊंगा |

-       फु: ! इस कागज़ को दिखाना है ? क्या होगा इसे दिखाकर ?

-       ये कागज़ नहीं है | मेरा सर्टिफिकेट है ये | इस पर मेरे स्कूल-इस्पेक्टर का दस्तखत है, ये देखो | लेकिन तुमने तो इसे तोड़-मरोड़ कर रख दिया | - लगभग रुआंसा होकर मैंने कहा |

-       अरे, ये तो तुम्हारी बेवकूफी का सर्टिफिकेट है !

-       अच्छा ! तुम्हारे पास तो ऐसा सर्टिफिकेट नहीं हैं न ?

-       मेरे पास क्या-क्या है, तुम क्या जानोगे?

-       और न मैं जानना चाहता हूँ ! – मैंने खीझ कर कहा |

-       हाँ, इसलिए कि तुम अभी बड़े हुए कहाँ हो जो यह सब समझ सकोगे?

-       जाओ, जाओ, मैं तुमसे सब कुछ बहुत ज्यादा जानता हूँ !

-       तुम ! मुझसे ज्यादा?

-       क्यों, अभी देखा नहीं तुमने मेरा ये सर्टिफिकेट ?

-       तुम और तुम्हारा ये सर्टि –फि-केट !

-       अच्छा, छोडो, मुझे जाने दो ! – मैंने अपना हाथ छुड़ाना चाहा 
|
-       नहीं मानोगे? जाओगे ही ? ठीक है मैं गिनती हूँ – एक – दो – ढाई ...

क्षण-भर के लिए उसकी आँखे जैसे जम गईं – जैसे उसकी आँखों की हरियाली में आस-पास के लत्तरों की हरियाली एकबारगी और गहरा गई |...

-       ती—न ! ठीक है जाओ !

उसने मेरा हाथ छोड़ दिया, और क्षण-भर में ऐसे बदल गई जैसे कोई और हो – वह न हो | फिर धीरे-धीरे वह उन लत्तरों वाले कुञ्ज से बाहर आ गई, और मैं भी उसके पीछे-पीछे चुपचाप वहां से खिंचा चला आया |
उसकी माँ और मेरी माँ – दोनों उस मैग्नोलिया के पेड़ के नीचे एक हरे बेंच पर बैठी बातें कर रही थीं, और वह भी जाकर वहीँ, उनकी बगल में बैठ गई | दोनों हाथों से अपना स्कर्ट घुटनों पर से नीचे की ओर खींचती हुई वह लापरवाही से बोली –

-       यह पास हो गया !               
                                                      - 'नया ज्ञानोदय' (सितं. २०१८) में प्रकाशित 



 (C) मंगलमूर्त्ति    चित्र:  सौजन्य गूगल छवि-संग्रह  

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२०१९
दिसं.१ : मग्नोलिया का फूल (अनूदित कहानी) / नवं. २४ : मेरी कहानी-२: बूढा पेड़ / नवं. १४ : मेरी कहानी-१: कहानी का अंत / नवं २ : बिरवा-१ / अक्तू. २७ : झरोखा-७ ताकूबोकू  इशिकावा / अक्तू. १८ : झरोखा-६ स्पेंसर / सितं २३ : झरोखा-५ ऑडेन / अगस्त २७ : नई धारा’-सम्मान भाषण (विडिओ) / अगस्त १७ : नागर-स्मृति, ये कोठेवालियां / अगस्त १३ : झरोखा ४ ब्लेक / जुलाई २१ : झरोखा-३ बर्न्स / जून ३० : झरोखा - २ फ्रॉस्ट / मई ५ : कविता का झरोखा - १ : ब्राउनिंग 

२०१८
नवं २६ : जगदीश चन्द्र माथुर / अगस्त १७ : कुंदन सिंह-केसर बाई / जुलाई १७ : शिव और हिमालय / जून १२: हिंदी नव-जागरण की दो विभूतियाँ / जन. २४ : आ. शिवपूजन सहाय पुण्य-स्मरण (व्याख्यान, राजभाषा विभाग, पटना) 
  
 ०१७
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Saturday, November 23, 2019


मेरी कहानी : २

बूढ़ा पेड़

तने का रस-संचार सूखने लगा । छाल दरकने लगी । मोटी-पतली शाखें अकड़ने लगीं । पत्ते पीले पड़े और एक-एक  कर झड़ गये । एक नंगी, सूखी ठठरी बर्फीली हवाओं के थपेड़े झेलती फिर भी खड़ी रही - उस अंधड़ के इंतज़ार में  जो  एक दिन उसकी जड़ें हिलाकर उसे गिराने आएगा । तब आएगा वह लकड़हारा, अपनी कुल्हाड़ी लिए,  उसकी   शाखें काटने, और फिर और लोग भी जाएंगे - तेज़ दांतों वाले बड़े-बड़े आरे लिए उसके तने को चीर-चीर कर कुंदों में बदलने ।  फिर गाड़ियों में लाद कर उसके कुंदों को मिलों में पहुंचाया जाएगा । बची-खुची टहनियों-टुकड़ियों को तो  लोग-बाग चुन कर जलावन के लिए ले ही जाएंगे । यह सब सोचते-सोचते पेड़ गहरे सोच में  डूब गया । उसे लगा, वह आगे होने वाली बातों को भी बिलकुल साफ-साफ देख रहा था, जैसे किसी बड़े आइने में अपनी ही शक्ल देख रहा हो - तब से आज तक की कहानी । तब से जब वह एक झूमता-गाता, लहराता, हरा-भरा दरख़्त था, और आज का यह सूखता-उकठता उसका नंगा बदन ।

वह आइने को ध्यान से देखने लगा । उसके कुंदे जब मिलों में पहुंचे थे तो वहां बहुत दिनों तक यों ही पड़े रहे थे -  जब तक उनके  भीतर का बूंद-बूंद रस सूख नहीं गया । उसके सभी कुंदों को एक-पर-एक सजा दिया गया था और उन पर कुछ निशान लगाए गए थे । जब बारिष होती थी तो वे भींग जाते थे, फिर धूप उन्हें सुखा देती थी । कुछ दिन बाद उन्हे ले जाकर पास के बड़े टीन की छत वाले गोदाम में रख दिया गया था । वहां कीड़े, गिलहरियां, बिच्छू और सांप सभी आकर उनके आस-पासचक्कर लगाया करते । लेकिन इससे उनका कुछ मन ही बहलता । गोदाम से अक्सर  मज़दूर कुंदों को ले जाकर बड़ी-बड़ी आरा-मशीनों पर डाल देते । आरा मशीनें बड़ी सफाई से देखते-देखते उन कुंदों को चीर-चीर कर लंबे-लंबे तख़्तों में बदल देतीं । लेकिन जब कुंदों के जिस्मों को चीर कर तख़्तों में बदलने का काम चलता होता तो शोर इतना ज्यादा, इतना कर्कश होता कि टीन की सारी छत और पूरे गोदाम की लकड़ियों के पोर-पोर थरथराने लग जाते । फिर काम में लगे सारे मज़दूरों का ज़ोर-ज़ोर का हो-हल्ला, गाली-गलौज, सब उस शोर में मिलकर उसको और असहनीय बना देते । लेकिन यह सब तो वहां सुबह से रात तक चलता ही रहता था, और वहां सब लोगों को इसकी आदत पड़ चुकी थी ।

उसने यह भी देखा कि उसके सभी कुंदों को एक दिन चीर-चीर कर तख़्तों में तब्दील कर दिया गया था । अब उसके तख्ते भी बाज़ार में बिकने को तैयार हो चुके थे | सब पर नंबर लगाए जा चुके थे । मैंनेजर ने उन्हें एक   सिलसिले से उनकी जगह पर रखवा भी दिया था । मिल-मालिक अपने केबिन में कंप्यूटर के सामने उसकी ख़रीद-फ़रोख़्त का हिसाब भी  लगाने लगा था । पेड़ को लगा - चिड़िया की चोंच में लाए बीज से धीरे-धीरे जमीन से  फूटे एक पौधे से बढ़ कर एक जवान लहराते हरियाले दरख़्त बने उस पेड़ की कहानी, उसकी अपनी कहानी, यों ही खतम हो चुकी थी । अब तो उसकी याद शायद किसी मेज-कुर्सी या दरवाजे में ही सिमट कर रह जाती, या शायद हमेशा  के लिए मिट ही जाने वाली थी ।

लेकिन बूढ़े पेड़ ने सोचा, उसकी अपनी यही कहानी तो उस लकड़हारे और उस मिल-मालिक के जीवन की      कहानी भी थी । या उन मज़दूरों की, जिनकी रोज़ी-रोटी उस तेज़ दांत वाले खूंखार आरा-मशीन से चलती थी, या  फिर उस मोल-तोल, नाप-जोख करने वाले ख़रीददार की, जिसने उन तख़्तों को अपने हिसाब से सस्ते में खरीदा था, हालांकि मालिक अपने मुनाफ़े से काफ़ी ख़ुश  लगा था । और यही मोल-भाव, यही नफ़ा-नुकसान, यही सारा  लेन-देन तो इस जीवन की कहानी है, बूढ़ा पेड़ सोचता रहा ।

इस तरह की बातें अब इस उम्र में वह बूढ़ा पेड़ अक्सर सोचा करता । इस बुढ़ापे में अब वह बिलकुल अकेला हो चुका था । अब उसकी सूनी डालों पर चिड़ियों की चहचहाहट कहां  होती थी । हवा भी अब हरियाले पेड़ों की  ओर ही अपना रुख ज्यादा रखती थी । उसके पास से कभी गुज़रती भी तो चुपचाप आगे बढ़ जाती । अब उसकी डालों में पत्ते भी कहां बचे थे, टुक रुक कर जिनसे हवा उनका गीत सुनती । अब तो कभी-कभार, इक्के-दुक्के  कोई चिड़िया उड़ते-उड़ते उसकी किसी उंची डाल पर आकर थोड़ी देर सुस्ता लेती थी, और फिर तुरत उड़ जाती  थी । इधर उसने देखा था, कोई चील आती, या एक बड़ा-सा गिद्ध जरूर उसके सिर की डाल पर आकर अक्सर बैठ जाता था, और बड़ी देर तक बैठा-बैठा जाने क्या सोचा करता था । उसे लगा, कोई राहगीर भी अब उसके तले आकर कहां बैठता-सुस्ताता था, क्योंकि अब तो वह सिर्फ़ एक बूढ़ा, सूखा, बिना पत्तों का ठठरीनुमा पेड़ ही रह गया था ।
   
लेकिन वह सोचता रहा - बचपन से बुढ़ापे तक उस पेड़ ने किसी से कुछ लिया नहीं था, सबको कुछ कुछ    दिया ही । हर साल मौसम में अपने फूल-फल, थके मुसाफिर को ठंढी छांव,  चिड़ियों को उनके घोंसले,  पत्ते    बटोरने वाली को रोज़ ढेर सारे पत्ते, और हवाओं को उनका संगीत । लेकिन कभी  उसने ख़ुद किसी से कुछ मांगा नहीं, लिया नहीं ।  धूप नहीं हुई तो भी वह उतना ही मगन रहा । हवा नहीं बही  तो वह चुप ही रहा ।  बारिश नही आई, प्यास लगी रही, वह इंतज़ार करता रहा । फिर जब धूप आई वह मुस्कुरा उठा । हवा बही तो खिल-खिलाकर हंस पड़ा । बारिश आई तो झूम-झूमकर नाचा, नहाया । पत्ते-पत्ते को  धो लिया । डाल-डाल संवर गईं । तारे उग आए तो गीत गुनगुनाने लगा । रात जब सोई तो ही उसे भी नींद आई ।

सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से उसकी नींद खुली । फिर पत्ते हिला-हिलाकर उसने एक-एक पंछी को काम पर   जाने के लिए विदा दिया । अपना मन वह दिन-भर राहगीरों की आवाजाही से बहलाता रहा । फिर दिन ढलते ही उसको अपने परिजन परिंदों का इंतज़ार सताने लगा । एक-एक कर उनका लौटना वह गिनता रहा, और तब तक उसे चैन नहीं आया जब तक उसके सारे पंछी अपने घोंसलों में नहीं गए । और फिर तो सब ने मिल कर इतना शोर मचाया कि वह भला किसकी-किसकी सुने । किसी ने किसी के मुंडेरे का हाल कहा, तो किसी ने कोई और ही दर्द-भरी दास्तान सुनाई, और कुछ मनचलों ने तो अजीब-अजीब कहानियां सुना कर उसका खूब मन बहलाया । फिर भी पता नहीं उस दिन दिन-भर उसका मन इतना उदास क्यों रहा था ।

चिड़ियों की कहानियां सुनकर उसको लगता, रोज़ की उनकी हर कहानी तो एक ही जैसी होती, लेकिन उनके अंदर कहानी-दर-कहानी जाने कितनी नई-नई कहानियां छिपी होतीं । वह सबको सुनता और गुनता रहता । पूरे गांव से लेकर पास के शहर तक की तरह-तरह की ताज़ा ख़बरें उसको बैठे-बिठाए मिल जातीं । उसके पत्ते बटोर कर ले जाने वाली जवान लड़की का हाल । उस लड़की के बूढ़े बीमार बाप का हाल जो अब सुबह से शाम तक बैठा खांसता रहता ।  उसके घर वाले का हाल जो पहले जंगल से लकड़ी काटकर लाता और बेचता था और अब पास के शहर में एक आरा मिल में मज़दूर का काम करता था । लकड़ी के कुंदों को गाड़ियों से नीचे उतारना, या तख़्तों को ठेलों पर लदवाना, या आरा-मशीन पर तख़्ते चिरवाना, उनको गिनना, मालिक को हिसाब बताना । बात-बात में मालिक का उसको भद्दी गालियां देना । गांव से लेकर शहर तक की ऐसी सारी ख़बरें उस बूढ़े पेड़ को रोज़ मिलती रहती थीं । अच्छी भी और बुरी भी । उसे लगा, आखि़र इसी तरह तो वह बूढ़ा हुआ है । लेकिन उसे सब अच्छा ही लगता रहा । दुख-दर्द की बातें सुन कर भी अब वह बिलकुल निस्पंद रहा किया । खुशी और ग़म के किस्से कभी उसको बहुत अलग-अलग नहीं लगते, क्योंकि रोज़ तो जाने ऐसे कितने किस्से उसे सुनने पड़ते थे ।

फिर उसको उस चिड़िया की याद आई जो बराबर शहर के उस लकड़ी मिल में जाया करती थी । शहर के उस लकड़ी-मिल में दरख़़्तों के कटे कुंदों और तख्तों की खरीद-बिक्री होती है । चिड़िया वहां सब कुछ देखती रहती है, क्योंकि उसको उन मैदान में पड़े कुंदों में तरह-तरह के कीड़े खाने और घर ले आने को मिल जाते हैं, जैसे और जगह उतनी आसानी से नहीं मिलते ।  वहीं हुए एक दिन के हादसे का बयान करते-करते तो चिड़िया का गला एकदम रुंध आया था - जिस दिन उसने अपनी आंखेां से एक मज़दूर का हाथ साफ़ कट जाते देखा । वह एक  कुंदे पर बैठी एक कीड़े को खाने जा रही थी कि उसका ध्यान बंट गया । कीड़ा तो उड़ ही गया, लेकिन उस मज़दूर की चिल्लाहट सुनकर और फौव्वारे की तरह बहता उसका ख़ून देखकर तो चिड़िया को जैसे गश आ गया । बड़ी आरा मशीन एकाएक रुक गई, उसका भयानक शोर भी अचानक रुक गया । पूरे मिल के अहाते में अफ़रा-तफ़री मच गई । वह डरकर उंचे बिजली के पोल पर जा बैठी । वहां से सब कुछ, सारी भाग-दौड़ वह डरी-डरी देखती रही । उसका सारा बदन ज़ोर-ज़ोर से कांपता रहा । फिर वह उड़कर उस अस्पताल तक भी गई जहां मिल-मालिक ने अपने आदमियों से उस मज़दूर को पहुंचवाया था । बहुत देर तक चिड़िया वहीं एक दीवार पर बैठी सब कुछ देखती रही, और वह घायल मज़दूर वहीं बरामदे में बेहोश पड़ा रहा । ख़ून से उसके सारे गंदे कपड़े सन गए थे । बहुत देर तक चिड़िया वहीं सकते में बैठी रही । पर आखि़र वह कब तक वहां बैठी रहती; फिर उड़ कर कहीं और चली गई ।  लेकिन उसका मन तब से फिर बराबर उदास ही रहा । शाम हुई और जब वह पेड़ पर अपने घोंसले में बच्चों के पास आई तो उसने उदास मन से रोते-रोते यह सारी कहानी पेड़ को सुनाई । पेड़ का मन भी कुछ देर के लिए उदास हो गया; लेकिन उसको तो अब तक जाने ऐसे कितने हादसों की, कितने तरह के हादसों की कहानी सुनने को मिली थी - और अब तो वह उनकी गिनती भी भूलने लगा था ।

चिड़िया बाद में भी कई दिन तक उस हादसे का हाल रुंधे गले से उसको सुनाती रही थी । जिस दिन लकड़ी-मिल में यह हादसा हुआ था, वह लड़की, उस मज़दूर की घरवाली भी, वहां रोती-भागती गई थी । तब मिल के मालिक ने उसका कंधा पकड़कर उसको बहुत ढाढ़स बंधाया था और काफी रुपये भी दिए थे । फिर जल्दी-जल्दी अपने मिनी-ट्र्क से उस घरवाली के साथ मजदूर को अस्पताल भी भिजवाया था । चिड़िया ने यह सारी तफ़सील रोते-रोते पेड़ को सुनाई थी । और पेड़ बेचारा बस चुपचाप अपने आंसू पीता रहा - जैसी उसकी आदत थी ।

जब भी वह चिड़िया उड़ती हुई उधर जाती, कोशिश करती अस्पताल का एक चक्कर काट ले । अक्सर पत्ते बटोरने वाली वह लड़की जिसका मर्द वहां भरती था, वहां दिखाई दे जाती, लेकिन ज्यादातर रोती-बिसूरती हुई । उसको देखकर ही चिड़िया को समझना पड़ता, उसके मर्द का हाल कैसा है । लेकिन यह सिलसिला कई हफ़्ते तक चलता रहा । चिड़िया की उलझन बराबर बनी रही । पेड़ अपने पत्तों से सहला-सहलाकर उसको ढाढ़स बंधाने की कोशिश करता और समझाता कि दुनिया फ़ानी है, हादसों की एक लंबी कहानी है । हादसों की जाने कितनी  ही ऐसी कहानियां यहां रोज़ घटती हैं । लेकिन जिंदगी की  रफ़्तार इसी तरह चलती रहती है । इसी तरह रोज सुबह होती है, रोज शाम होती है । रात का अंधेरा घिेरता है तो दिन का उजाला भी उस अंधेरे को मिटाने अपने समय से आ जाता है, रोज़--रोज़ । आखि़र यह धरती तो जाने कबसे इसी तरह दिन और रात के बीच अनमनी-सी धूमती रही है । लेकिन इस तरह बराबर दौड़ते-नाचते हुए भी वह कहां थकती है, कहां उबती है । और मौसम भी तो फिर-फिर बदलते हुए भी एक-सां ही बने रहते हैं । वे कहां घबराते या उबते हैं ।

चिड़िया जानती है, पेड़ की उमर उससे बहुत ज्यादा है । अब वह घीरे-धीरे उम्रदराज़ हो रहा है । उसने बहुत दुनिया देख ली है । अब वह बूढ़ा हो चला है । लेकिन चिड़िया है कि उस हादसे से अब तक उबर नहीं पाई है । मिल में उड़कर उसका रोज़ जाना और कीड़े-मकोड़े चुगना तो बदस्तूर जारी है । मिल की आरा मशीनों का बेतहाशा शोर तो हर रोज़ उसी तरह चलता रहता है । लकड़ी के कुंदे रोज़ उसी तरह वहां गिरते और सजाए जाते हैं । मैनेजर उन पर उसी तरह रोज़ नंबर लगवाता रहता है । आरा मशीन पर कुंदे उसी तरह रोज़ चिरते रहते हैं । मालिक आज भी अपने केबिन में बैठा हिसाब-किताब में उसी तरह मशगूल रहता है।

लेकिन चिड़िया को अब वहां बहुत बदलाव भी नज़र आता है । जिस मज़दूर की बांह कटी थी अब उसे मज़दूरों का मेठ बना दिया गया है । अब उसको बैठने की एक अच्छी जगह मिल गई है । वह मिल-मालिक और मैनेजर की ही तरह अब और मज़दूरों को भद्दी-भद्दी गालियां देता रहता है । और अब वह लड़की, उसकी बीवी भी मिल-मालिक के केबिन में बे-रोक-टोक आती-जाती है । मालिक का खाना भी घर से अब वही लाती है, और दिन में खाना खाने के लिए जब काम बंद होता है, तो वही मालिक को टेबुल पर अपने हाथों से परसकर खाना खिलाती  है । मालिक की उससे अब हंसी-ठिठोली भी ख़ूब होती है । रोज़ बदलने वाली रंग-बिरंगी साड़ियों और गोरे- गदराए बदन पर सजे हुए ज़ेवरों में अब वह खूब फ़बती है ।

लेकिन चिड़िया का मन अब यह नया सब कुछ उस बूढ़े पेड़ को बताने का नहीं होता ।

  
-    दोआबा (पटना,अक्तू. २०१२) में प्रकाशित

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चित्र : सौजन्य - (१) कैरोलिन लोगन, फ्लोरिडा  (२) गूगल छवि-संग्रह

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