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Monday, December 30, 2024

 श्रीवीरेन्द्र नारायण जन्म-शती प्रसंग : २ 

[१६.११.१९२३ – १६.११.२०२३]


साहित्य की सभी विधाओं में नाटक की अपनी विलक्षणता होती है। नाटक जीवन के सत्यासत्य को उसकी विविधता एवं संपूर्णता में, श्रव्य एवं दृश्यकाव्य के रूप में, एक साथ व्यष्टि और समष्टि के सामने सघन संवेदनानुभूति के लिए प्रस्तुत करता है। उसमें स्थूल तथा सूक्ष्म संप्रेषण की सभी संभावनाएं एक साथ उपलब्ध होती हैं। उसका उत्स जहां कल्पना-काव्य में होता है, वहीं अपने प्रगति-मार्ग में वह कहानी, उपन्यास, पुराण और इतिहास के विस्तृत प्रांतरों से गुजरता हुआ, उनसे नई ऊर्जा ग्रहण करता हुआ आगे बढ़ता है, और अंततः अपने अन्यतम प्रशस्त स्वरूप में, एक सुसंगठित स्थूल-काया में, रंगमंच-प्रदर्शन के माध्यम से दर्शकों का रस-बोध कराते हुए, अपने गंतव्य को प्राप्त होता है।

शेक्सपियर की गिनती विश्व के महानतम नाटककारों में होती है। नाटक से उसका परिचय भी पहले-पहल भ्रमणशील नाटक-मंडलियों के द्वारा ही हुआ था, पर 25-26 साल की उम्र में ही वह नाटककार के रूप में लंदन के नाट्य-परिदृश्य का एक ईष्य व्यक्तित्व बन चुका था-अचानक नहीं, बल्कि पहले एक अभिनेता के रूप में, जिसने नाटक-लेखन से पूर्व नाटक की आत्मा को एक अभिनेता के रूप में ही पहचाना था। विश्व-साहित्य में शेक्सपियर शायद ऐसा अकेला नाटककार है जिसके नाटक, वह जिस नाटक-मंडली का पेशेवर अभिनेता था, उसके प्रदर्शनों के लिए, लगभग प्रदर्शनों के दौरान 'प्रॉप्टर-शीटों' पर उसके द्वारा लिखे और काटे-छांटे जाते थे, जिनसे ही वे सारे लगभग तीन दर्जन नाटक उसकी मृत्यु के सात साल बाद उसके सह-अभिनेताओं जॉन हेमिंज और हेनरी कौडेल द्वारा पहली बार संपादित होकर फ़र्स्ट फ़ोलियो नाम से 1623 में प्रकाशित हुए थे। शेक्सपियर के सभी नाटक उसके अभिनय एवं प्रदर्शन के पेशेवर जीवन की कृतियां थे, और जैसे कोई कुशल रसोइया व्यंजन बनाते-बनाते उसको चखते हुए उसे अधिक से अधिक स्वादिष्ट बनाता है, लगभग उसी तरह शेक्सपियर ने निरंतर रंगमंच की कसौटी पर कसते हुए अपने सभी नाटकों की रचना की थी। यही बात काफी हद तक विश्व-साहित्य के कई महान नाटककारों-इब्सन, चेखव, लोर्का और ब्रेख़्त के बारे में भी सच है, जिन सबका गहरा जुड़ाव उनके नाटकों के रंगमंचीकरण से बराबर बना रहा, भले ही उनकी भूमिका उनमें अभिनेता की नहीं रही हो, पर इन सभी और अन्य बहुत सारे, जिनमें बंगला, मराठी और हिंदी के भी कई नाटककार गिने जा सकते हैं, के नाटकों के अंतिम स्वरूप उनके रंगमंच पर हुए प्रदर्शनों के दौरान निर्मित होते रहे।

अभिनय से ही नाटक के प्रति आकर्षित होकर वीरेन्द्र नारायण अपने जेल जीवन में पहली बार 1943 में नाटक-लेखन की ओर प्रवृत्त हुए; लेकिन नाटक की आत्मा से उनका पहला साक्षात्कार लंदन के नाट्य-प्रशिक्षण के दौरान 1955 में हुआ, जब-जैसा उन्होंने लिखा है- उन्हें अपने प्रशिक्षण के क्रम में ही चेखव के नाटक चेरी ऑर्चर्ड में फ़ियर्स की भूमिका करनी पड़ी, अथवा बेल्जियन नाटककार फ़ेरेंज मोलनार के नाटक लिलियम में अभिनय करना पड़ा।

उनके प्रायः सभी नाटक उनके स्वदेश लौटने के बाद साठ, सत्तर और अस्सी के तीन दशकों में लिखे गए। इनमें से कई तो विभागीय दायित्व के अंतर्गत लिखे गए, जिनमें चौराहे पर और धर्मशाला  विशेष रूप से सफल एवं लोकप्रिय सिद्ध हुए, और कुछ ध्वनि-प्रकाश विधा वाले नाटक भी-जैसे श्रीरामचरितमानस, विद्यापति, सुब्रह्मण्य भारती आदि, उन्हीं अन्य

नाटकों की तरह देश के विभिन्न भागों में प्रदर्शित होकर अत्यंत लोकप्रिय हुए। इनमें सभी का निर्देशन तो वीरेन्द्र नारायण ने किया ही था, कुछ में अभिनय भी किया था। इस प्रकार उनका नाटक-लेखन संभवतः हिंदी के किसी और नाटककार के मुकाबले प्रतिपल रंगमंच के जीवंत अनुभवों से अनुप्राणित होता रहा। रंगमंच से इस निरंतर लेन-देन का उनके नाटकों के शिल्प और स्वरूप पर गहरा प्रभाव पड़ा, और उनमें निश्चय ही इस कारण एक कसाव और निखार आया है।

वीरेन्द्रजी के लेखकीय जीवन के प्रारंभ से ही मेरा संपर्क उनसे स्थायी रूप से तब बन गया जब 1948 में मेरी बड़ी बहन सरोजिनी से उनका विवाह हुआ। उसके बाद कुछ दिन मैं उनके ही अभिभावकत्व में रहकर पटने में पहले स्कूल की

और फिर कॉलेज की पढ़ाई करने लगा। उन दिनों वे नई धारा में सहायक संपादक थे। नाट्यालोचन में उनकी गहरी अभिरुचि तभी से थी जिसका एक सशक्त प्रमाण था उनके संपादन में प्रकाशित नई धारा का 'बर्नार्ड शॉ' विशेषांक। इसके लिए उन्होंन बर्नार्ड शॉ के नाटकों के तीन खंड कलकत्ते से खरीद कर मंगवाए थे, यद्यपि तब उनकी तनखाह केवल 125 रु. प्रति माह ही थी। इसी के बाद नई धारा से त्यागपत्र देकर वे नाट्य-प्रशिक्षण के लिए इंग्लैंड चले गए थे।

मैं उनकी प्रतिभा से अभिभूत इसलिए भी था कि मैं निरंतर उसकी छाया में ही पल रहा था। वीरेन्द्रजी भारतीय शास्त्रीय संगीत के गहरे जानकार थे और उनके नियमित सितारवादन के प्रभाव में मेरा झुकाव भी संगीत की ओर बढ़ा था। हिंदी साहित्य सम्मेलन में संचालित कलाकेंद्र में भी मैं नियमित रूप से उनके साथ जाता था जहां वे रवीश बाबू के साथ सितार का अभ्यास करते थे और मैं वहां बांसुरीवादन सीखता था। पटना में आयोजित कई नाट्य-प्रदर्शनों के वाद्यवृंद में भी मैं शामिल होता था, क्योंकि उनके संगीत-निर्देशक मेरे गुरु श्री अयोध्याप्रसाद होते थे जो सोनी महाराज और बाबू श्यामनारायण सिंह के शिष्य थे। वीरेन्द्रजी की ही सोहबत में मैं भी कभी-कभार किसी नाटक में छोटा-मोटा अभिनय किया करता था। पर वीरेन्द्रजी लंदन जाने से पूर्व ही पटना और दिल्ली में बेनीपुरीजी के प्रसिद्ध नाटक अंबपाली में अरुणध्वज की अपनी भूमिका से सबको प्रभावित कर चुके थे। अंबपाली वाले उस नाट्य-दल में वाद्यवृंद के एक सदस्य के रूप में मैं भी दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य समारोह (दिसंबर, 1955) वाले प्रदर्शन में शामिल हुआ था।

इंग्लैंड से प्रशिक्षण पाकर लौटने के बाद वे गीत एवं नाटक प्रभाग की नौकरी में दिल्ली चले गए। दिल्ली में ही 60 के दशक से नाट्य-लेखन और नाट्य-कर्म में उनकी प्रतिभा का उत्तरोत्तर विकास होने लगा। उसके बाद के तीन दशक उनके सर्जनशील जीवन में सर्वाधिक उर्वर सिद्ध हुए। इस बीच उन्होंने अनेक नाटकों की रचना के अलावा कई उपन्यास, कहानियां, नाट्य-समालोचना आदि भी लिखे जिनमें जयशंकर प्रसाद के स्कंदगुप्त नाटक पर उनका नाट्यालोचन तीन लंबी किस्तों में हैदराबाद की प्रसिद्ध पत्रिका कल्पना में प्रकाशित हुआ और पर्याप्त चर्चित भी हुआ। इसी अवधि में नाट्यालोचन पर उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें भी प्रकाशित हुई अंगरेजी में हिंदी ड्रामा ऐंड स्टेज तथा हिंदी में रंगकर्म जिनका हिंदी-जगत में बहुत स्वागत हुआ ।

नाटक के क्षेत्र में वीरेन्द्र नारायण की उपलब्धियां जहां एक ओर उसके तीन पक्षों को समृद्धि प्रदान कर रही थीं- नाटक-लेखन, रंगमंच-कर्म तथा नाट्यालोचन, वहीं दूसरी ओर इन तीनों मोर्चों पर उनको दिल्ली में विभागीय असहयोग तथा दिल्ली नाट्य-जगत में द्वेष और उपेक्षा से भी जूझना पड़ रहा था। समस्या का एक तीसरा पहलू था उनके अंतर के कलाकार का अपनी कलाकृति से उत्तरोत्तर उत्कृष्टता के लिए संघर्ष। अत्यधिक कार्यालयी व्यस्तता, नगर के रंगकर्मियों में अस्वीकार-भाव, अपनी ही रचना से निरंतर असंतोष का भाव तथा उनका बार-बार पुनर्लेखन, आदि ऐसे अनिवार्य व्यवधान बराबर बने रहे जिनके कारण वे अपने नाटकों के प्रकाशन के प्रति पर्याप्त सचेष्ट नहीं रह पाए। मैं जब भी दिल्ली जाता वे अपने तीन-चार ऐसे नाटकों के पुनर्लिखित रूप मुझे बराबर पढ़कर सुनाते और मेरी राय मांगते, यद्यपि एक कुंठा उनके मन में मेरी तरह के विश्वविद्यालयी लोगों के प्रति बराबर बनी रही जिसका स्पष्ट कारण था विश्वविद्यालयों में होने वाली नाटकों की पढ़ाई के प्रति उनके मन में एक स्थायी वितृष्णा का भाव। लेकिन किसी हद तक मैं स्वयं भी उनके इस दृष्टिकोण से सहमत रहा कि नाटकों के प्रति उनके प्राध्यापकीय विश्लेषण से न्याय नहीं किया जा सकता, नाटकों के अध्येता को भी दर्शक-दीर्घा में ही जाकर बैठना जरूरी है, और उसके जीवंत प्रदर्शन को ही उसे अपने नाट्यालोचन का आधार बनाना उचित है। इसी अर्थ में शेक्सपियर के नाटकों पर लिखी ग्रेनविल बार्कर की भूमिकाओं का अकादमीय अध्येताओं के लिए भी विशेष महत्व है।

अपने कुछ नाटकों का कई बार के पुनर्लेखन करने के बाद, मेरे बार-बार कहने पर, 1993 में उन्होंने अपने चार नाटकों के एक संग्रह को प्रकाशित करने का निश्चय किया, जिसके लिए उन्होंने बाजाप्ता एक लंबा लेखकीय वक्तव्य तैयार किया, लेकिन कई कारणों से यह संग्रह उस वक्त प्रकाशित नहीं हो सका और बहस की भूमिके ऐसे वक्तव्य उन्होंने जलग-अलग अन्य सभी नाटकों के लिए नहीं लिखे, और यह एक प्रकार से सुविधाजनक भी था, क्योंकि बहुधा नाटककार के ऐसे वक्तव्य रंगमंच के प्रोसिनियम' के अलावा एक और अतिरिक्त चौखटा खड़ा कर देते हैं, जो मूल नाटक की आत्मा पर एक आवरण डाल देता है, जिससे पाठक दर्शक की रस-निष्पत्ति में अकसर बाधा भी पड़ती है। हर श्रेष्ठ नाटक गर्भस्थ शिशु की तरह स्वयमेव जीवन के स्पंदन से भरा-पूरा- एक संपूर्ण कृति होता है, जो जीवन को दर्शक दीर्घा में अभिनय और संप्रेषण की सारी संभावनाओं से परिपूर्ण होकर रंगमं पर आता है।

अपने जीवन की संख्या में वीरेन्द्र नारायण एक गहरे अवसाद-बोध से ग्रस्त हो गए थे जिसके विभिन्न मनोवैज्ञानिक कारणों में एक निश्चय ही था अपने नाटकों को प्रकाशित तथा मंचित होते देख पाने का मन पर बोझ। जीवन के अंतिम वर्षों में वे जिस पतंग पर सोते थे उसी में उन्होंने अपनी सभी रचनाओं की पांडुलिपियों बंद रखी थीं। उनके सिरहाने टंगा हुआ उनका प्यारा सितार जैसे उनके जीवन-नाट्य का मूक संगीत प्रतिपल ध्वनित करता प्रतीत होता था। शायद यही कारण था कि उन्होंने अपनी डायरी बस जीवन के इन्हीं अंतिम दिनों में लिखी, और बस वहीं उनके नाटककार का एकल संवाद अंकित हुआ। आप बखूबी उनकी डायरी को उनके जीवन-नाट्य के अंतिम अंक के रूप में पढ़ सकते हैं। वह अपने आप में एक त्रासद एकांकी है।

परिवार के एक सदस्य के नाते मैं उनके निकटतम व्यक्तियों में रहा, जिसने उनके वास्तविक एवं सृजनात्मक जीवन- दोनों को, बहुत निकट से देखा। यह आकस्मिक नहीं था कि उनके जीवन के अंतिम क्षणों में भी मैं ही उनके सबसे निकट था, जिसने उन्हें प्राण-वायु से विदा लेते हुए भी देखा। वही उनके जीवनाभिनय की अंतिम झलक थी। वह सचमुच सभी अर्थों में एक अभिनेता नाटककार का महाप्रस्थान था जिसे एक अभिभूत दर्शक की दृष्टि से देखने और अपना प्रणाम अर्पित करने का सौभाग्य (?) वहां केवल मेरा था। उस त्रासद एकांकी का करुण अंत महीने भर बाद ही मेरी पत्नी कुसुम के देहांत से हुआ जिसे वह अपनी बेटी की तरह मानते थे। यह एक ऐसे नाटक का कथानक था जिसमें स्वयं मेरी भी एक छोटी-सी भूमिका थी, शायद लियर के विदूषक जैसी।

अंततः हमने यह निश्चय किया कि इस कथानक को इसकी परिणति तक पहुंचाने के लिए पलंग के बक्से में बंद उन सारी पांडुलिपियों की जांच-परख करके उन्हें एक व्यवस्थित रूप में प्रकाशित किया जाय। जिसके परिणामस्वरूप यह ग्रंथावली आज हिंदी-जगत के सामने प्रकट हो रही है। यह एक मुकम्मल म्यूरल है-वीरेन्द्र नारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व का-पांच दीवारों पर चित्रित, इन पांच प्रकाशित खंडों में। अपनी संपूर्णता में यह वीरेन्द्र नारायण के जीवन का उपन्यास और नाटक दोनों है। मेरा यह परम सौभाग्य है कि इनको इस रूप में प्रस्तुत करते हुए मैं उनकी स्मृति-रक्षा में अपनी ओर से, और पूरे परिवार, मित्र-समुदाय और प्रशंसकों की ओर से भी सम्मिलित श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूं।

पलंग के उस तहखाने से उन सारी पांडुलिपियों को निकालकर उनकी पूरी जांच-पड़ताल करना एक अत्यंत कठिन कार्य था, क्योंकि सभी कुछ बिलकुल गड्डमड्ड था। पहले तो सारी सामग्री की छानबीन में दो-तीन महीने लग गए। एक-एक नाटक की कई-कई प्रतियां थीं, जिनमें कुछ हस्तलिपि में थीं, पर अधिकांश टंकित प्रतियों में थीं। लेखों की भी बहुधा एक से अधिक प्रतियां थीं। वहुत सारे पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उपन्यास, कहानियों और नाटकों के रिप्रिंट थे। एक बड़ी कठिनाई यह थी कि कई पांडुलिपियां अधूरी थीं, और अधिकांश को लेखक ने फिर दुहराया नहीं था। इसके अलावा जिन पांडुलिपियों के टंकण-कार्य दफ्तर में हुए थे, उनमें बाहर से डाली हुई अजीबोगरीब भूलें थीं जिनके सिर-पैर का मिलान बहुत कठिन था। फिर एक निश्चित समय-सीमा के भीतर संपादन और प्रकाशन के कार्य को पूरा करने का निर्णय भी कठिनाइयों को हल करने में बाधक था। कुछ ऐसी पांडुलिपियां भी थीं-जैसे पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास वाणभट्ट की आत्मकथा अथवा सतीनाथ भादुड़ी के उपन्यास ढोंढ़ाईचरित मानस का श्रृंखलाबद्ध रेडियो-रूपांतर
जिसका अंतिम पूर्ण स्वरूप नहीं उपलब्ध था और उनके प्रकाशन में कॉपीराइट का प्रश्न भी जटिल था। बहुत सारी ऐसी रचनाएं भी थीं- प्रारंभिक लेखन की, अथवा प्रथमदृष्ट्या कम महत्व की, जिन्हें आकार की सीमा के बाहर रखना आवश्यक हो गया। किस्सा-कोताह यह कि संपादन की पहली चुनौती थी कितना लें और कितना या क्या छोड़ें। दूसरी चुनौती थी समय-सीमा के अंदर उस सारी सामग्री को प्रकाशन के लिए व्यवस्थित करना और उनका संपादित स्वरूप तैयार करना। एक और कठिनाई थी, जो सामग्री उस संग्रह में नहीं थी उसे बाहर से एकत्र करके उसमें यथास्थान मिलाना। लेकिन यह काम वह व्यक्ति अपने पीछे छोड़ गया था जिसने हर चुनौती की सींग सामने से पकड़कर उसका सामना किया था। कह सकते हैं कि, इस बार भी इन चुनौतियों को स्वीकार करने की हिम्मत उसी व्यक्ति की अलक्ष्य प्रेरणा थी।

इस सारी उपलब्ध एवं नव-व्यवस्थित सामग्री को पांच खंडों में बांटा गया है। 

उनका सबसे पहला प्रकाशित नाटक निश्चय ही सूरदास (1960) था, लेकिन शेष नाटकों में चौराहे पर और धर्मशाला को छोड़कर बाकी लगभग सभी नाटक अस्सी के दशक में ही लिखे गए। इन सभी नाटकों में केवल श्रीरामचरितमानस ध्वनि-प्रकाश मंचन के लिए लिखा गया था, अन्यथा प्रायः शेष सभी नाटक यथार्थवादी मंच के लिए ही लिखे नाटक हैं, - यद्यपि इनमें से तीन नाटक-अरज मोरी तुमसे, विक्रम दुष्यंत का तथा प्रभु-लीला-मूलतः प्रयोगधर्मी हैं, जिनमें पहला, बिहार की प्रसिद्ध नाट्य-शैली 'बिदेसिया' पर आधारित है, दूसरा, कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम् पर आधारित विडंबनात्मक शैली में लिखा नाटक है, तथा अंतिम, प्रभु-लीला रासलीला नाट्य-शैली पर आधारित नाटक है। निश्चय ही ये सभी नाटक लंबे समय तक रंगमंच के लिए प्रासंगिक रहने वाले नाटक हैं, और विभिन्न प्रदर्शन-शैलियों में मंचन के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं। इनमें से कई नाटकों ने तो मंच पर अद्भुत सफलता प्राप्त की है।            

                                                                                - मंगलमूर्ति         

                                          [वीरेंद्र नारायण ग्रंथावली (५ खंड) की भूमिका से] 

सभी चित्र एवं आलेख (C) डा. मंगलमूर्ति 




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