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Tuesday, June 27, 2023

 

गंगा बाबू                                                    

 

काल के प्रवाह में, समाज में कुछ ऐसे व्यक्तियों का भी प्रादुर्भाव होता है जो अपने समय में अपना अत्यंत प्रभावशाली जीवन व्यतीत करते हैं, उनके कार्य-कलाप भी अत्यंत लोक-प्रभावी एवं महत्त्वपूर्ण होते हैं, लेकिन इतिहास की इबारत में उनका जीवनाख्यान अंकित होने से छूट जाता है, और वह अपनी पीढ़ी की परतों में ही दबा जैसे मिट जाता है | बिहार में वैसे भी ऐसा अनेक क्षेत्रों में बहुधा होता रहा है | स्वाधीनता संग्राम के दौरान समाज में और हिंदी साहित्य के क्षेत्र में बिहार में ऐसे अनेक नाम हैं जो अपनी पीढ़ी के साथ ही लोक-स्मृति से विलुप्त हो गए | कुछ ऐसे ही नाम हैं – ब्रजकिशोर प्रसाद, मजहरुल हक, पं. सकल नारायण शर्मा; संगीत के क्षेत्र में पं. रामचतुर मल्लिक; कला के क्षेत्र में ईश्वरी प्रसाद वर्मा, आदि |

इन्हीं में एक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण नाम जुड़ता है – बाबू गंगा शरण सिंह का जो समाज, राजनीति और साहित्य के बीच एक सेतु की तरह रहे| साहित्य के वृत्त से– शिवपूजन सहाय, बेनीपुरी, सुधांशु और दिनकर से वे उसी सहृदयता से जुड़े रहे जिस तरह राजेंद्र प्रसाद और  जेपी जैसे कांग्रेसी और समाजवादी खेमे के नेताओं से | गूगल पर उनके विषय में अत्यल्प सूचनाएं हैं, लेकिन वे ३-४ सत्रों में राज्यसभा के सांसाद भी रहे, और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में बेनीपुरी आदि के साथ जुड़े रहे | तीस के आंदोलित दशक में बेनीपुरी के साथ ‘युवक नामक क्रांतिकारी साहित्यिक पत्रिका का सह-सम्पादन करते रहे, और आजीवन बिहार की पत्रकारिता में – जनता, योगी, नवराष्ट्र, नई धारा, आदि साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़े रहे | बेनीपुरी ने ‘मुझे याद है’ शीर्षक अपनी संस्मरण-पुस्तक में ‘युवक के दिनों की विस्तार से चर्चा की है जब गंगा बाबू ने ‘युवक के प्रकाशन के लिए अपनी पत्नी के स्वर्णाभूषणों को बेच कर पैसे इकट्ठे किये थे. और किस मुफलिसी में पटना कॉलेज के सामने एक साधारण सी कोठरी में बेनीपुरी के साथ, अपनी रसोई बनाकर, बर्त्तन धोकर और चटाई पर एक ही रजाई में सो कर रातें बिताई थीं |

मेरे पिता ५० के दशक में पटना आ गए थे | ‘जनता का प्रकाशन उसी समय हुआ था | मेरे बहनोई श्री वीरेन्द्र नारायण उसमें बेनीपुरी के साथ सह-सम्पादक थे | नया टोला में उसका छोटा सा दफ्तर था | मैं वीरेन्द्रजी के साथ ही रहता था | वीरेंद्रजी मेरे पिता के कारण जेपी, बेनीपुरी और अन्य सभी समाजवादी नेताओं के अत्यंत प्रियजन थे और उनके साहचर्य में मेरा उन सभी समाजवादी नेताओं – जेपी, बेनीपुरी, बसावन सिंह, अवधेश प्रसाद सिंह, बी.पी. सिंह (बारिस्टर), श्यामनंदन सिंह ‘बाबा, रज़ी अहमद,  आदि से निकट का संपर्क रहता था | गंगा बाबू काग्रेस के समाजवादी दल के ही नेता थे | साहित्य से गंभीर रूप से जुड़े होने के कारण वे मेरे पिता के भी उतने ही समीपी रहे | उनदिनों बाद में मैं अपने पिता के साथ बिहार हिंदी साहित्य सम्मलेन भवन में ही रहने लगा था जहाँ रोज शाम में इन सभी लोगों का – ख़ास कर साहित्य से जुड़े लोगों – बाबूजी, बेनीपुरीजी, सुधान्शुजी, नलिन जी, रजा साहेब, दीक्षितजी, दिनकरजी, आदि से नित्यप्रति की भेंट हुआ करती थी | सम्मलेन भवन का एक बड़ा-सा कमरा ‘अनुशीलन विभाग कहलाता था जिसमें ये जमावड़ा अक्सर हुआ करता था | उनदिनों मुझको फोटोग्राफी का नया शौक हुआ था और उस समय की मेरी खींची हुई कुछ तस्वीरें आप यहाँ भी देख सकते हैं | ऐसी तस्वीरों का एक बड़ा ज़खीरा मेरे संग्रह में है | ( यद्यपि मैं इन दिनों स्वास्थ्य-लाभ के लिए अपनी बेटी के पास गोवा में हूँ, जहाँ बहुत-सी सन्दर्भ सामग्री मेरे पास अभी नहीं है |)

गंगा बाबू बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के संचालक मंडल के सदस्य भी रहे, और मेरे पिता की डायरियों में गंगा बाबू से सम्बद्ध अनेक प्रसंग अंकित हैं | (देखें ‘शिवपूजन सहाय साहित्य समग्र, खंड ६-७) | यहाँ जो चित्र दिए गए हैं उनमें एक तो अनुशीलन विभाग का है जिसमें (बाएं से) पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी, गंगा बाबू, शिवजी, दीक्षित जी और पं. जगन्नाथ प्रसाद शर्मा देखे जा सकता हैं, और दूसरे दो चित्र १९५६ के हैं जब जेपी परिषद् में गंगा बाबू के साथ आये थे | जेपी और मेरे पिता के परस्पर सम्बन्ध भी पारिवारिक तो थे ही  साहित्यिक भी अत्यंत घनिष्ठ थे | जिस दिन जेपी परिषद् में मिलने आये थे उनको माथे में थोड़ी चोट लगी हुई थी जिस पर पट्टी लगी है | उस अवसर के दोनों चित्र भी सम्मेलन भवन के ही हैं | सीढ़ी से उतरते हुए चित्र में शिवजी, बेनीपुरी, गंगा बाबू और जेपी हैं | और उसी अवसर के दूसरे समूह चित्र में बाएं से अनूप लाल मंडल, शिवजी, जेपी, बेनीपुरी और गंगा बाबू देखे जा सकते हैं |

गंगा बाबू पर एक स्मृति-ग्रन्थ का प्रकाशन होना चाहिए था | उषाकिरण जी ने बताया कि ऐसा एक ग्रन्थ महिला चरखा समिति, पटना, से प्रकाशित भी हुआ था | लेकिन गंगा बाबू के यथोपलब्ध सम्पूर्ण लेखन और उनपर लिखी गई संस्मरण-सामग्री का एक सुलभ पुस्तकाकार प्रकाशन भी अवश्य होना चाहिए | बालक, युवक, जनता, योगी, नवराष्ट्र, नई धारा आदि  बिहार के उन दिनों के पत्रों में ढूँढने पर पर्याप्त सामग्री अभी भी मिल सकती है, यदि कोई इस दिशा में सघन प्रयास करे | आशा है इसकी ओर ध्यान अवश्य दिया जायेगा |

सभी चित्र (C) डा. मंगलमूर्ति 

कृपया बिना पूर्वानुमति के इन चित्रों को कहीं प्रकाशित न करें |

संपर्क: bsmmurty@gmail.com Mob. 7752922938


 
      

      

                  

 

 

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