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Wednesday, September 9, 2026



 















कोई डर नहीं कवि से सिवा सच के’

तीन कविताएं

टेड जोन्स  

‘मैं कविता हूँ जीवन में कविता का’

सभी

प्रिय कविता....

मैं लिखता हूँ तुमको

क्योंकि तुम ही

सच हो

और कुछ नहीं

सच के सिवा

प्रिय कविता

विशुद्ध कविता

हम सभी की

कविता

 

सत्य

 

अगर तुम देखते हो

एक आदमी को

भीड़-भारी सड़क पर

पैदल चलते हुए

जोर-जोर से बोलते

अपने-आप से

तो भागो मत

दूसरी तरफ़

बल्कि भागों उसकी तरफ़

क्योंकि वह एक ‘कवि’ है !

 

तुम्हें डरने की ‘कोई’ जरूरत नहीं

उस कवि से, नहीं

बल्कि उस ‘सच’ से

 

जाज़ज़् का देह-साज

 

मेरा सिर एक ट्रंपेट है

और दिल एक ड्रम  

दोनों हाथ पियानो हैं

दोनों पावं बास वॉयल्स

और मेरा पेट ट्राम्बोन है

दोनों फेफड़े बाँसुरियाँ  

मेरा शिश्न एक वायलिन है

मेरी छाती एक गिटार

और पसलियाँ वाइब्स हैं

दोनों आँखें हैं सिमबालज़्

मेरा मुहँ ही संगीत-लेख है

और मेरी आत्मा वहाँ है

जहां संगीत है   

    

टेड जोन्स [1928-2003] एक अश्वेत अमेरिकन ‘बीट’-पीढ़ी का  कवि था जो मानता था कि पृष्ठ पर की कविता उसके जीवन की कविता से सर्वथा अभिन्न है। उसका कहना था –“जाजज़् ही मेरा धर्म है और अतियथार्थवाद ही मेरा दृष्टिकोण है।" उसकी कविता भी रूसी कवि मायकोव्स्की की तरह क्रांतिवादी परंपरा की  कविता है। उसके एक मित्र के अनुसार जोन्स “एक अंतरराष्ट्रीय अतियथार्थवादी जुझारू यायावर था” जिसने सहारा मरुभूमि को अठारह बार आर-पार किया था। वह एक अतियथार्थवादी चित्रकार और संगीतज्ञ भी था, पर वह कविता को ही अपना जीवन मानता था।

उसके विषय में अधिक पढ़ें – poetryfoundation.org पर और जोन्स की मूल अंग्रेजी कविताएं कल पढ़ें मेरे अंग्रेजी ब्लॉग – murtymuse.blogspot.com पर।

आलेख (c) डा। मंगलमूर्त्ति चित्र : साभार गूगल                    

 

 

 

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