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Saturday, August 8, 2026

 

जयंती : 133

आचार्य शिवपूजन सहाय

 

हिन्दी नव-जागरण के प्रतिमान-पुरुष

 

शिवपूजन सहाय के अमर उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का यह शती-वर्ष है। इनमें लगभग 90 वर्ष मेरे अपने जीवन के भी शामिल हैं। ‘देहाती दुनिया’ का एक प्रामाणिक शती-संस्करण भी शीघ्र ही प्रकाशित हो रहा है। उसमें मेरी लिखी एक लंबी प्रस्तावना ‘मेरी देहाती दुनिया’ नाम से छप रही है, जो जल्दी ही मेरे ब्लॉग पर भी प्रकाशित होगी। उसमें आधुनिक समालोचना-दृष्टि से हिन्दी उपन्यास में शिवपूजन सहाय के विशिष्ट योगदान पर सम्यक प्रकाश डाला गया है। हिन्दी के शिखर-आलोचक प्रो. परमानन्द श्रीवास्तव ने अपने एक जयंती-भाषण में शिवपूजन सहाय को प्रेमचंद की तरह का ‘जनता का लेखक’ कहा था। मैं अपनी बात उसी भाषण की कुछ पंक्तियों के उद्धरण से शुरू करना चाहूँगा। परमानंदजी ने उस भाषण में कहा था -   

 

शिवपूजन सहाय सच्चे अर्थों में जनता के लेखक हैं.. शिवपूजन सहाय एक ऐसे लेखक थे जिन्हें आप हिन्दी नवजागरण के स्तंभों में गिन सकते हैं.... प्रेमचंद की तरह वे हिन्दी नवजागरण के बहुत सारे रूपों को अपने लेखन से चरितार्थ करने वाले लेखक थे।.. कुछ लेखक ऐसे होते हैं जो अपने समय मे तो महत्त्वपूर्ण होते ही हैं, समय जैसे-जैसे आगे जाता है, वैसे उनके महत्त्व के नये रूपों की खोज शुरू होती है। उनका नये सिरे से आविष्कार किया जाता है, नये सिरे से उनको पढ़ा जाता है। .. एक बहुत सीमित अर्थ में साहित्यकार स्वभाव के लेखक वे नहीं थे। कवि, कथाकार से बड़ा व्यक्तित्व लेकर वे आए थे .. वे साहित्य को एक मूल्य की तरह जी रहे थे अपने जीवन में .. सारी कलाएं निछवार हैं शिवपूजन सहाय जैसे लेखक पर .. कला के मानदंड बनाने वालों को चुनौती है कि वे उनके प्रकाश में अपने कला के मानदंडों की नये सिरे से छानबीन करें, नये टूल्स, नये औज़ार, नये माध्यम चुनें..

 

मैं समझता हूँ इतने स्पष्ट और नपे-तुले शब्दों में हिन्दी नवजागरण काल में शिवपूजन सहाय की तरह के तपस्वी साधक साहित्यकार के योगदान का मूल्यांकन और किसी ने नहीं किया है। शिवपूजन सहाय -परमानंदजी ने ठीक कहा है – “कवि, कथाकार से बड़ा व्यक्तित्व लेकर वे आए थे .. वे साहित्य को एक मूल्य की तरह जी रहे थे अपने जीवन में”। और इन शब्दों की सच्चाई को मैंने अपनी इन आँखों से उनके साथ रहते हुए वर्षों तक देखा और  अनुभव किया है, और मैं कह सकता हूँ कि उनके समकालीनों में साहित्य को एक मूल्य की तरह जीने वाले साहित्यकारों मे जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद ओर निराला जैसे कुछ ही और साहित्यकारों के नाम शायद गिने जा सकते हैं।

 

आप केवल उनके शताधिक साहित्यिक संस्मरणों को पढिए तो उनमें आपको एक पूरा युग - जिसकी आज ‘हिंदी नव-जागरण’ के नाम से इतनी चर्चा हो रही है - एक चलचित्र की तरह आँखों के सामने सजीव हो उठता है | घोर अभाव और रोज़ की रोटी कमाने वाले संघर्ष में जीते हुए हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले इन साहित्यकारों के  सौहार्द और संवेदना से ओतप्रोत उस जीवन-काल को ही हम हिंदी-आलोचना की भाषा में ‘हिंदी नव-जागरण’ के नाम से जानते हैं। मेरे द्वारा संपादित आत्मकथा-रूप में प्रकाशित उनके संस्मरणों के संग्रह ‘मेरा जीवन’ को पढ़ कर बच्चनजी ने एक पत्र में मुझको लिखा था “वे अपने वांगमय में साक्षात उपस्थित हैं। उनके संस्मरणों में एक युग ही सचित्र हो उठता है।.. सहायजी को पढ़ना उनकी आँखों से एक ऐसे युग का साक्षात्कार करना है (जिसे हम ‘हिन्दी नव-जागरण’ के नाम से जानते हैं), जो खेद के साथ कहना पड़ता है, अपनी सदाशयता, आदर्शवादिता और रोचकता लिए सदा के लिए चल गया है।”

हम यह कह सकते हैं कि जैसे आधुनिक हिन्दी साहित्य में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एक ही हुए, जैसे प्रेमचंद और निराला भी एक ही हुए, वैसे ही हिन्दी साहित्य में शिवपूजन सहाय की तरह का साहित्य-साधक एक ही हुआ। वास्तव में,शिवपूजन सहाय ने  अपना साहित्य ही अपने जीवन में जिया| और इसी अर्थ में, उनका साहित्य और उनका  जीवन -  अविच्छिन्न हैं, अविभाज्य हैं | मैंने उनके समय के साहित्यकारों को भी निकट से देखा, बिहार के भी और बाहर के भी लेकिन उनलोगों के जीवन और साहित्य-लेखन में मुझे वह ऐक्य-भाव अथवा अटूट समन्वय नहीं दिखा जो  मैंने अपने पिता के जीवन में देखा | शिवपूजन सहाय निश्चय ही हिन्दी नव-जागरण के प्रतिमान-पुरुष थे |      

 

(c ) डा.मंगलमूर्त्ति

नोट : 'शिवपूजन सहाय:जीवन और साहित्य' नेट पर तथा सभी प्रमुख शहरों में प्रकाशन विभाग के विक्रय-केंद्रों में उपलब्ध। मूल्य: २९०/-

 

  जयंती : 133 आचार्य शिवपूजन सहाय   हिन्दी नव-जागरण के प्रतिमान-पुरुष   शिवपूजन सहाय के अमर उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ का यह शती-वर्ष...