जगदीशचन्द्र माथुर : कुछ स्मृतियाँ
मंगलमूर्त्ति
नाटक मूलतः दृश्य-विधा है | साहित्य-लेखन की अन्य सभी
विधाओं – कविता,कहानी, उपन्यास आदि - से नाटक अपने प्रदर्शन-पक्ष की प्रधानता के
कारण एक अनन्य एवं भिन्न प्रकार की संश्लिष्टता से मंडित विधा है | रंगमंच इसका अभिन्न अंग है, जिसके बिना
अपने लिखित और पठित रूप में यह कला का एक अपूर्ण रूपक बना रह जाता है | कविता,
कहानी, उपन्यास आदि में भी उनके वाचित रूप में उनमें प्रभविष्णुता का एक अतिरिक्त
सृजन संभव होता है, लेकिन नाटक में वह वाचित रूप एक जटिल संश्लिष्टता धारण करते
हुए ही – मंच, अभिनेता और उपस्कर जिसके
अनिवार्य तत्त्व होते हैं – प्रभावोत्पादन की अपनी पूर्णता प्राप्त कर पाता है | शब्द का महत्त्व और उसका अर्थ-निक्षेपण साहित्य की अन्य
लिखित विधाओं की तुलना में नाटक में उसके सजीव रंगमंचन से बहुगुणित हो जाता है |
निश्चय ही नाटक में महत्तम सम्प्रेषण की जैसी शक्ति होती है – और श्रोता/दर्शक
वर्ग के मिश्रित किन्तु एकान्वित समूह पर उसका जैसा प्रभाव हो सकता है, वैसा
अन्य विधाओं में संभव नहीं हो पाता |
ग्रीक, रोमन अथवा यूरोपीय पुनर्जागरण काल के नाटक या प्राचीन काल के संस्कृत
नाटकों को इसी कारण जो लोकप्रियता प्राप्त थी उससे कविता या कहानी की प्रतिस्पर्धा
संभव नहीं थी | और इसीलिए जब कोई रचनाकार प्रथमतः ही अपने लेखन के लिए नाटक की
विधा का चुनाव करता है, तो स्पष्टतः वह साहित्य की इस कठिन विधा की असीम
सम्भावनाओं से आकृष्ट होकर ही ऐसा करता है | सामान्यतः तो नाटक की विधा का चुनाव
करने वाला रचनाकार साहित्य की अन्य विधाओं का वरण ही नहीं करता, और न उन विधाओं
में वह उत्कर्ष प्राप्त कर पाता है | हिंदी में नाटक की विधा का विकास भी उस ऊंचाई
को नहीं छू सका जैसा यूरोप की भाषाओं में देखा जाता है, जिसका एक बड़ा कारण रहा हिंदी
में रंगमंच का अविकसित, आकारहीन स्वरुप का एक लम्बा दौर | यूरोप में रंगमंच
किसी-न-किसी रूप में सदा नाटक के
प्रादुर्भाव के पूर्व से ही उपस्थित रहा था | लेकिन हमारे यहाँ स्थिति बराबर कुछ उलट ही रही –
नाटक को सदा उपयुक्त रंगमंच की तलब
बनी रही, और आज भी यह स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती |
इसी पृष्ठभूमि में हम एक ऐसे रचनाकार को साहित्य के
नाट्य-मंच पर सहसा प्रवेश करते देखते हैं, जिसका आना क्षण-भर के लिए अप्रत्याशित
और विस्मयकारी लगता है | स्वतन्त्रतापूर्व इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी
पढ़ने वाला एक २२ वर्षीय युवक वहां के नाट्य-मंच पर एक अभिनेता के रूप में प्रवेश
करता है, जैसे यह घोषणा कर रहा हो कि उसने अपनी रचनाशीलता के लिए सोच-समझकर ही इस
विधा का चुनाव किया है | विश्वविद्यालय से
निकल कर वह युवक उस समय की सबसे ऊंची
ओहदेदार आई.सी.एस. की परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, और पदस्थापन के क्रम में
बिहार पहुंचता है | ऐसे ही एक प्रतिभावान, संभावनाशील युवक थे – जगदीश चन्द्र माथुर, जिन्होंने अपनी सृजन-यात्रा
में हिंदी को न केवल कुछ अत्यंत सफल नाटक दिए, वरन हिंदी रंगमंच और लोक-नाटक के
पुनरुत्थान का एक पूरा विधान ही प्रस्तुत कर दिया |
अंग्रेजों के समय की प्रशासनिक सेवा में शुरू में जगदीश
चन्द्र माथुर बिहार के वर्त्तमान वैशाली जिले में पदस्थापित हुए , और वहां की
समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के उन्नयन में उन्होंने अपने को पूरी तरह समर्पित कर
दिया | उन्होंने ही वहां ‘वैशाली संघ’ की स्थापना की, और वैशाली की उस गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा को पुनर्परिभाषित
करने को वे कटिबद्ध हो गए | संघ के लिए एक ‘वैशाली स्मारक ग्रन्थ’ प्रकाशित करने की योजना के अंतर्गत उन्होंने हिंदी साहित्य के
ख्यात आचार्य शिवपूजन सहाय को एक पत्र (३१.५.४७) लिखा– “श्रद्धेय शिवपूजन जी |
वैशाली संघ की ओर से आपको एक कष्ट देना है |” ( शिवपूजन सहाय की साहित्यिक ख्याति
से वे पूर्व-परिचित थे, क्योंकि एक उच्च पदाधिकारी होते हुए भी वे मूलतः साहित्य-धर्मी
थे | उनको उस ग्रन्थ के लिए “कलकत्ते के सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ प्रो. ओ.सी.गांगुली
का लेख – वैशाली की महत्ता” प्राप्त हुआ था, “जिसे उन्होंने अपनी निराली हिंदी में
लिखा है, किन्तु उसका निरालापन हिंदी पाठकों के लिए शायद असह्य हो | लेख की भाषा
को परिमार्जित करने के लिए आप ही का सहारा लेना है |... कष्ट के लिए क्षमा |” माथुर साहब का अनुरोध था कि शिवपूजन सहाय उस लेख
की अनगढ़ भाषा का संशोधन कर दें | शिवपूजन
सहाय के लिए – जब अभी वे राजेन्द्र कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर थे – यह एक सर्वथा प्रत्याशित हिंदी-सेवा-कार्य ही
था, जिसे वे कभी अस्वीकार नहीं करते थे | (हालांकि इस अनिच्छित कार्य से उनको अपने
स्वाध्याय और लेखन-कर्म में बराबर बाधा पहुंचती रहती थी और इसीलिए वे बहुधा अपनी
डायरी में अपनी यह व्यथा टांकते रहते थे |
एक अन्य प्रसंग में आगे कहीं उन्होंने लिखा था
– “क्या इश्वर की इच्छा है कि मैं दूसरों की लिखी चीजें जांचता रहूँ – खुद
कुछ न लिखूं?”)| लेकिन यह शिवपूजन सहाय का
एक समर्पित संस्कृति-कर्मी प्रशासनिक अधिकारी जगदीश चन्द्र माथुर से पहला संपर्क
था, और वे इस कार्य का विशेष महत्त्व समझ रहे थे | कालान्तर में जगदीश चन्द्र
माथुर से उनका यह पहला संपर्क घनिष्ठता में परिवर्त्तित हो गया |
कुछ ही समय बाद जगदीश
चन्द्र माथुर पटना में शिक्षा-सचिव होकर पटना आ गए | उनकी सांस्कृतिक योजनाओं में बिहार
में एक साहित्यिक संस्था – बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् - की स्थापना भी थी, जिस पर
बिहार के शिक्षा-मंत्री आचार्य बदरी नाथ वर्मा के प्रोत्साहन से गंभीरतापूर्वक
विचार हो रहा था | बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के लिए शिवजी का नाम संभावितों की
सूची में रखा गया था | शिवजी तब राजेन्द्र कॉलेज, छपरा में हिंदी के प्राध्यापक थे
|उन्होंने अपनी डायरी में लिखा (१२-१३.१२.४९) – “आज ही पहले-पहल सरकारी पत्र मिला
कि राष्ट्रभाषा परिषद् का मंत्री मैं चुना गया हूँ | बिहार सरकार की ओर से राष्ट्रभाषा
परिषद् का मंत्री बिहार में साहित्य समृद्धि के लिए नियुक्त होगा |जगदीश चन्द्र
माथुर ने कल पटना सेक्रेटेरिएट में बुलाया भी है | आज रात में जाना होगा |”

दिसंबर-अंत में शिवजी राजेन्द्र कॉलेज, छपरा से लम्बी
छुट्टी लेकर पटना चले आये | उन्होंने अपने परिवार को गाँव भेज दियाऔर केवल मुझको अपने साथ लेकर पटना आए |
बिहार हिंदी साहित्य सम्मलेन भवन में ही वे एक कमरे में रहने लगे | माथुर साहब से
हर दिन-दो दिन पर सेक्रेटेरिएट जाकर उनका मिलना होता था | वहां बिहार राष्ट्रभाषा
परिषद् की पूरी रूपरेखा तैयार होने लगी | शिवजी पूरी योजना बना कर ले जाते थे और
शिक्षा-विभाग में उस पर विचार-विमर्श होता था और तदनुसार सरकारी कार्रवाई होती थी
| शिवजी ने जुलाई में कॉलेज को अपना त्यागपत्र भेज दिया और परिषद्-मंत्री-पद पर नियुक्त
हो गए | इस बीच माथुर साहब से मिलने और विचार-विमर्श का सिलसिला भी लगातार चलता
रहा था, जिसके विवरण शिवजी की
डायरी में बराबर अंकित होते रहे | परिषद् कार्यालय भी तब तक अंततः सम्मलेन-भवन में
ही अवस्थित हो गया था | शिवजी की ’५० से ’५५ की डायरी में माथुर साहब से सम्बद्ध कुछ उल्लेख
यहाँ उद्धरणीय हैं –
“माथुर साहब साहित्यिक अफसर हैं, अत्यंत सहृदय |
प्रतिभाशाली और तेजस्वी पुरुष हैं, विनयशील भी |...शिक्षा-मंत्री आचार्य बदरीनाथ वर्मा और माथुर साहब को मैंने
राष्ट्र-भाषा की समुन्नति के लिए ‘परिषद्’ की विस्तृत योजना दिखाई और उन लोगों ने
परिषद् की विद्वतसभा के सदस्यों की सूची दी |....माथुर साहब ने बड़ी दिलचस्पी
दिखाई | उन्हीं के प्रस्ताव से सब कामों के लिए अलग-अलग कमिटी बनाने का निश्चय हुआ
|....” (१० जन.-८ अक्तू.’५०)
“शिक्षा-सचिव माथुर साहब के साथ दो घंटे तक परामर्श होता
रहा | सहृदय साहित्यिक व्यक्ति हैं | कलात्मक और सांस्कृतिक सुरुचि है | सूझ-बूझ
बड़ी बांकी है | परिषद् के तो प्राण ही हैं |....मैंने जो योजना बना कर दी थी,
जिसमें अहिन्दी-भाषा-भाषी सरकारी अफसरों को हिंदी सिखाने के नियम और तरीके हैं तथा
पाठ्य-ग्रन्थ और प्रश्नादि हैं | मेरी योजना को शिक्षा-सचिव ने पसंद किया और कुछ
आवश्यक परिवर्त्तन के सुझाव भी दिए |.... आज सम्मलेन में ‘कला और कलाकार’ संस्था
की ओर से अभिनीत श्री माथुर साहब का एकांकी नाटक ‘कलिंग-विजय’ देखा |....”
(१४मार्च -२९ सितं, ’५१)
“श्री माथुर साहब बड़े सहृदय व्यक्ति हैं | आई.सी.एस. अफसरों
में वही एकमात्र हिंदी-प्रेमी हैं | हिंदी-लेखक भी हैं | सफल नाटककार हैं |
साहित्यिकों का समादर भी करते हैं |
उन्होंने शिक्षा-विभाग में कई नई योजनाएं कार्यान्वित करके उन्हें सफल बनाया है
|... माथुर साहब के बदलने की अफवाह अगर ठीक निकली तो परिषद् का अपकार ही होगा |
माथुर साहब के सामान शिक्षा-सचिव शायद ही कोई हो |....” (२७ फर.’५२) |
लेकिन माथुर साहब १९५५ तक बिहार में शिक्षा-सचिव रहे, और
उसी वर्ष आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक होकर दिल्ली चले गए | बिहार राष्ट्र भाषा
परिषद् के इन प्राथमिक पांच वर्षों में शिवजी को माथुर साहब का पूरा समर्थन मिला,
और अपनी गंभीर अस्वस्थता की स्थिति में भी शिवजी को पूरा सरकारी सहयोग मिलता रहा |
और इस सहयोग-भावना का ही परिणाम था कि
शिवजी के निर्देशन में परिषद् में अनेक
महत्त्वपूर्ण साहित्यिक योजनाओं पर काम होता रहा, कई महत्त्वपूर्ण भाषण-मालाएं
आयोजित हुईं, बहुत-से शोधोपयोगी ग्रन्थ प्रकाशित हुए जिनमें –‘हिंदी साहित्य का
आदि-काल’(आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी), ‘योरोपीय दर्शन’(पं.रामावतार शर्मा,१९५२),
‘हर्ष-चरित’(डा. वासुदेव शरण अग्रवाल, १९५३), ‘बौद्ध-धर्म दर्शन’ (आचार्य नरेंद्र
देव), ‘मध्य-एशिया का इतिहास’ और ‘दोहा-कोश सरहपाद’(पं. राहुल सांकृत्यायन, १९५६-५७), जैसे
मानक ग्रंथों का प्रकाशन विशेष उल्लेखनीय है | इन सब के साथ ही कई और मौलिक
शोध-कार्यक्रम – जैसे आचार्य नलिन विलोचन शर्मा के निर्देशन में बिहार-भर से
हस्तलिखित पांडुलिपियों का संग्रह और साथ ही एक समृद्ध शोधोपयोगी पुस्तकालय का
संस्थापन, आदि कार्य चलते रहे | और इन सबके पीछे प्रच्छन्न रूप से शिक्षा-सचिव
जगदीश चन्द्र माथुर का विभागीय सहयोग शिवपूजन सहाय के साथ बराबर बना रहा | यहाँ तक
कि इस अवधि में गंभीर रूप से रोग-ग्रस्त रहने पर भी शिवजी को छुट्टी और आर्थिक
सहायता का सहयोग सरकार से मिलता रहा और
परिषद् ने उनकी ‘रचनावली’ के प्रकाशन की योजना को स्वीकृत कर उनको बीमारी
में ‘रचनावली’ के लिए अग्रिम रॉयल्टी-राशि उपलब्ध करा दी | इसी अर्थ में परिषद् के
कार्य-कलाप में जो श्रेय शिवपूजन सहाय को मिला उसमें जगदीश चन्द्र माथुर के सहयोग
का बहुत बड़ा योगदान था |
इसी अवधि से सम्बद्ध दो और उल्लेखनीय प्रसंग हैं जिनसे अपने
व्यक्तित्त्व में कई प्रकार की भिन्नता लिए हुए भी इन दो साहित्य-पुरुषों के
परस्पर सौहार्द और आत्मीयता का आभास मिलता है | पहले का सम्बन्ध है माथुर साहब की सर्वोत्कृष्ट कृति, उनके नाटक
‘कोणार्क’ से, जो पहले पटना से सद्यः प्रकाशित साहित्य-पत्रिका ‘नई धारा’ के
प्रारम्भिक कुछ अंकों में क्रमशः प्रकाशित हुई थी, और फिर अंततः पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुई | यह एक संयोग था कि परिषद् के एक
ही वार्षिकोत्सव (१९५५) में फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ के आंचलिक उपन्यास ‘मैला आँचल’ और
जगदीश चन्द्र माथुर के ऐतिहासिक नाटक ‘कोणार्क’ को परिषद् का नवोदित साहित्यकार
पुरस्कार प्राप्त हुआ था | मैंने उस अवसर के कुछ चित्र खींचे थे जिनमें विशिष्ट
अतिथि तत्कालीन कांग्रेस-अध्यक्ष ऊ.न. ढेबर से माथुर साहब और ‘रेणु’ जी के पुरस्कार-प्राप्ति
के भी चित्र हैं |
उन दिनों ‘नई धारा’ के प्रारम्भिक वर्षों में माथुर साहब की
कई रचनाएँ – उनकी डायरी, उनका नाट्यालोचन, उनका एक और नाटक ‘घोंसला’ - उसमें
प्रकाशित हुई थीं | शिवपूजन सहाय ने उनके विषय में बहुत ठीक लिखा था कि “श्री
माथुर साहब बड़े सहृदय व्यक्ति हैं | आई.सी.एस. अफसरों में वही एकमात्र
हिंदी-प्रेमी हैं | हिंदी-लेखक भी हैं | सफल नाटककार हैं | साहित्यिकों का समादर
भी करते हैं |” ‘समादर’ की इस अभ्यर्थना
की पृष्ठभूमि में शिवजी का उन्हीं दिनों वहीँ के एक अन्य आई.सी.एस. अधिकारी के
उनके प्रति हुए अवमाननापूर्ण व्यवहार की प्रच्छन्न ध्वनि गुंजित है | माथुर साहब
का उच्चाधिकारी पक्ष उनके साहित्य-संस्कृति प्रेम-पक्ष के सम्मुख सदा गौण रहा, इसका मुझको स्वयं भी
अनुभव हुआ, जब कुछ वर्षों बाद मुझे उनसे
मिलने का एक अवसर मिला |
माथुर साहब से जुड़े एक अत्यंत मनोरंजक प्रसंग की चर्चा
शिवजी की २५ मार्च, १९५३ की डायरी में अंकित है जो पटना कॉलेज के एक साहित्यिक
समारोह से सम्बद्ध है | शिवजी लिखते हैं – “पटना कॉलेज की हिंदी-साहित्य-परिषद् के
साहित्यिक सप्ताह का उदघाटन करने के लिए हिंदी विभागाध्यक्ष डा. विश्वनाथ प्रसाद
ने श्री महेश प्रसाद सिंह, यातायात-मंत्री से अनुरोध करते हुए कहा कि परिषद् का
घूंघट खोलिए ! महेश बाबू ने मज़ाक में कहा कि मुझ जैसे बूढ़े को घूंघट खोलने का काम
न सौंप कर किसी नौजवान को ही यह काम सौंपना चाहिए था | तब फिर, शिक्षा-सचिव श्री
जगदीश चन्द्र माथुर ने सभापति-पद से बोलते हुए कहा कि घूंघट खोलने की रस्म के बाद
का काम मुझ नौजवान को सौंपा गया है, तदर्थ धन्यवाद! अट्टहास!!!”
कैसे सौहार्दपूर्ण हास्य-व्यंग्य के दिन थे वे ! माथुर साहब
के समय में परिषद् में बीते शिवजी के वे पांच वर्ष उनके लिए विशेष सौहार्द और सहूलियत
के दिन थे, यद्यपि अपनी डायरी में जगह-जगह उन्होंने परिषद् संचालक मंडल के अपने
साहित्यिक मित्र सदस्यों के प्रति निराशा और अमर्ष का भाव भी व्यक्त किया है जिससे
परिषद की महत्त्वपूर्ण योजनाओं में पदे-पदे बाधा भी उत्पन्न होती रहती थी | लेकिन
जब तक माथुर साहब रहे, ये बाधाएं टलती रही थीं |
माथुर साहब के १९५५ में दिल्ली चले जाने के बाद परिषद् के
प्रति सरकारी सहयोग की स्थिति भी बिलकुल
विपरीत हो गयी | बिहार सरकार ने शिवपूजन सहाय को सितम्बर, १९५९ में इकरारनामे की
शर्त्तों के खिलाफ समय से पूर्व सेवा-निवृत्त कर दिया जिससे वे पेंशन से वंचित हो
गए, और उनके अंतिम वर्ष बहुत अभाव और कष्ट में बीते | माथुर साहब होते तो ऐसा शायद कभी नहीं हो पाता
| शिवजी ने इस अन्यायपूर्ण सेवा-निवृत्ति का कोई प्रतिरोध भी नहीं किया और कार्य-भार तुरत
त्याग दिया | माथुर साहब को जब ज्ञात हुआ तब उन्होंने शिवजी को पत्र लिखा
(२१.९.५९) : “आदरणीय शिवपूजन जी | आपके १ सितम्बर के पत्र से ज्ञात हुआ कि बिलकुल
वीतराग होकर आपने परिषद् के मंत्रित्व से मुक्ति पा ली | जब तक भार को आपने संभाला
तब तक दत्तचित्त होकर उसमें लवलीन रहे | जब बिना पूर्व-सूचना के कार्य-मुक्त होने
का अवसर आया तब बिना शिकायत-शिकवे के आप उससे अलग भी हो गए | ऐसा व्यवहार आप ही के
योग्य है | फिर भी मुझे आशा है कि आप के प्रति परिषद् का जो कर्त्तव्य है उससे
परिषद् के सदस्य विमुख न होंगे |’बिहार का साहित्यिक इतिहास’ का अनुष्ठान अवश्य
पूरा करें | थोड़े दिन निश्चिंत होकर विश्राम करें | मेरी राय है कि कुछ दिनों के
लिए दिल्ली आकर भी रहें; स्थान-परिवर्त्तन से अवश्य कुछ लाभ होगा |”
शिवपूजन सहाय की अवैधानिक सेवा-निवृत्ति और उनके जीवन के
अंतिम ३-४ वर्षों की करुण व्यथा-कथा की चर्चा यहाँ प्रासंगिक नहीं होगी | लेकिन
१९५९ के ही अक्टूबर-अंत में वे ‘आकाशवाणी’
की परामर्श-दात्री समिति की बैठक में भाग लेने वहां गए | उनका स्वास्थ्य चिंतनीय
था इस लिए मैं भी उनके साथ वहां गया |
माथुर साहब तब वहां ‘आकाशवाणी’ (जो उन्हीं का दिया हुआ नाम था) के महानिदेशक थे,
और समिति में शिवजी को उन्होंने ही मनोनीत किया था | दिल्ली-सचिवालय के एक प्रशस्त
कक्ष में बैठक हो रही थी | ‘बच्चन’जी, डा. नगेन्द्र, डा. राम कुमार वर्मा, श्री
रामचंद्र टंडन आदि अन्य सदस्य थे | श्री बी.वी.केस्कर (संचार-मंत्री) अध्यक्षता कर रहे
थे | माथुर साहब ने उन दिनों हिंदी के कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों को ‘आकाशवाणी’
से जोड़ा था | वे सरकार की नीतियों में जैसे हिंदी-हितैषणा के पर्याय ही बन गए थे |
अगली सुबह शिवजी अपने जामाता श्री वीरेंद्र नारायण और मेरे
साथ माथुर साहब से मिलने १२, लिटन लेन, उनके सरकारी आवास पर गए |वह ‘आकाशवाणी’ के महानिदेशक का आवास था, पर वहां
मैंने कहीं कोई ताम-झाम नहीं देखा | बंगले के बाहर और भीतर, फुलवारी से बैठक तक,
हर जगह सादगी और सरलता | माथुर साहब स्वागत के लिए बाहर आये तो उनके पहनावे में भी
वही सादगी और सरलता – मलमल का कुरता-पाजामा, पैरों में साधारण चप्पल और आँखों पर
वही पतले फ्रेम का चश्मा | चहरे पर भी वही सौहार्द वाली सुपरिचित मुस्कराहट ! यह
पहला दिन था जब मैंने माथुर साहब के चरण-स्पर्श किये थे | निकट से उनसे मिलने का
यह मेरा पहला अवसर था | मैं एम.ए. कर चुका था पर नौकरी अभी शुरू नहीं की थी |
माथुर साहब, बाबूजी और वीरेंद्रजी की यह अन्तरंग बातचीत
लगभग एक घंटे चली | माथुर साहब एक प्लेट में सेव के टुकडे छील कर रख रहे थे और
बातचीत भी चल रही थी | लेकिन उस बातचीत का बस एक टुकड़ा मेरी स्मृति में रह गया है
| इस बीच बातचीत हिंदी गद्य पर मुड गई थी और चलते-चलते राजा राधिकारमण की गद्य
शैली पर जा पहुंची थी | मैंने राजा साहब की कृतियां पढ़ी थीं और उनकी शैली के
पेंचो-ख़म से वाकिफ था | माथुर साहब ने कहा – “राजा साहब के लम्बे उपन्यासों का साहित्यिक
मूल्यांकन तो समालोचकों का क्षेत्र है, किन्तु उनके प्रशंसकों के लिए उनकी
गद्य-छटा अपने-आप में अलबेली है | राजा साहब के सम्पूर्ण साहित्य से उनके रेशमी
ताने-बाने में बुने गद्यांशों का एक संकलन प्रकाशित होना चाहिए जिसमें राजा साहब
की सर्वथा मौलिक गद्य-शैली का वैविध्य अपनी सम्पूर्णता में प्रतिबिंबित हो |”
माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और गद्य-लेखन के सूक्ष्म तत्त्वों से वे भली-भाँति परिचित थे |
उनका अपना गद्य भी ‘दस तस्वीरें’ अथवा उनके नाटकों में राजा साहब के पेंचो-ख़म वाले
गद्य से भिन्न है, किन्तु अत्यंत सुष्ठु और प्रगल्भ गद्य ही है, विशेषतः उनके
नाटकों में | स्पष्ट था कि वे शिवजी के गद्य जिसमें अलंकारिकता और सादगी के
अलग-अलग अनेक रंग थे, उसके भी प्रशंसक थे
| मेरे पिता के निधन पर प्रकाशित ‘नई धारा’ के स्मृति-विशेषांक में अपने सुन्दर
संस्मरण में उनका हिंदी-अंग्रेजी के मुहावरों से सजा हुआ गद्य इसका एक नमूना है :
“अंग्रेजी की कहावत के अनुसार, कुछ लोग चांदी का चम्मच मुख में लिए पैदा होते हैं
| पर, कुछ ऐसे भी हैं, जिनके शिशु-मस्तक पर ही श्रम-कण का मुकुट जड़ा होता है | वही
मुकुट लिए शिवपूजन जी अवतरित हुए, उसे लिए ही चले गए |” माथुर साहब का वह संस्मरण
अब मेरे द्वारा संपादित संग्रह ‘हिंदी-भूषण शिवपूजन सहाय में पढ़ा जा सकता है |
बाबूजी के निधन के पश्चात मैंने उनके संग्रहालय एवं साहित्य
के संरक्षण-प्रकाशन के विषय में माथुर साहब को एक लम्बा पत्र लिखा | तब वे एक बार
फिर तिरहुत कमिश्नर बन कर मुजफ्फरपुर (बिहार) आ गए थे | वहीँ से उनका उत्तर आया
(१२ जुलाई, १९६३) – “ प्रिय मंगलमूर्तिजी
| आपका २६ जून का पत्र मिला | श्री शिवपूजन सहाय जी के देहावसान के कुछ समय पश्चात
मैंने बिहार के शिक्षा-मंत्री श्री सत्येन्द्र नारायण सिंह जी को एक पत्र भेजा था,
उस पत्र की एक प्रतिलिपि साथ में भेज रहा हूँ | मुझे मालूम नहीं कि इस विषय में
क्या कार्रवाई की गयी है | फिर भी, मैं उन
प्रस्तावों के विषय में आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहूंगा |”
सत्येन्द्र बाबू वाला मूल पत्र (५ मार्च, १९६३) अंग्रेजी
में था जिसमें माथुर साहब ने सत्येन्द्र बाबू को लिखा था : “पिछले दिनों हिंदी
साहित्य सम्मलेन भवन में श्री शिवपूजन सहाय की शोक-सभा में आपने उस महान साहित्य-सेवी के सम्मान में उचित स्मारक के
निर्माण के सम्बन्ध में मुझसे कृपा पूर्वक सुझाव मांगे थे | मैंने इस पर विचार
किया है और निम्नांकित प्रस्ताव निवेदित हैं |” यह एक लम्बा पत्र था जिसमें शिवजी
की स्मृति में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् में एक ‘शिवपूजन सहाय साहित्यिक
संग्रहालय’ स्थापित करने का प्रस्ताव था जिसमें उनका सारा बहुमूल्य साहित्यिक
संग्रह संरक्षित हो सके | “यह संग्रहालय एक प्रकार से बिहार में एक बृहत्
साहित्यिक संग्रहालय का मूलाधार सिद्ध हो सकेगा जो सारे देश के लिए सार्वदेशिक
आकर्षण का एक दिशा-निर्देशक साहित्यिक केंद्र बन सकता है |” लेकिन थोड़े और पत्राचार
के बाद यह योजना सरकारी फाइलों में बंद हो गई | माथुर साहब भी राष्ट्र संघ के
‘कृषि-खाद्य-संगठन’ के पदाधिकारी होकर बैंकाक चले गए |
फिर कुछ वर्ष बीते और माथुर साहब सेवा-निवृत्त होकर दिल्ली
में रहने लगे थे तब मैंने जुलाई, १९७७ में उनको दुबारा स्मरण दिलाने के लिए उनकी
स्मारक योजना वाले अंग्रेजी पत्र की प्रतिलिपि संलग्न करते हुए उनको एक पत्र लिखा
| इस समय तक कर्पूरी ठाकुर बिहार के मंत्री हो गए थे और माथुर साहब ने जयप्रकाशजी
को एक पत्र लिखा था कि वे कर्पूरीजी से इस विषय में बातचीत करें | सितम्बर, १९७७ में माथुर साहब का पत्र मुझको
मिला, जिसमें उन्होंने लिखा : “मैंने
जयप्रकाश जी को लिखा है कि वे आपको बुलाकर कुछ बातचीत करें | वस्तुतः, शिवपूजन जी
के पत्र संग्रहालय तथा उनकी स्मृति के विषय में मेरे विचार अब भी वही हैं, जो
मैंने उस समय प्रकट किये थे | मैं अपने उस पत्र की प्रतिलिपि भी श्रीजयप्रकाश
नारायण को भेज रहा हूँ | मेरा निश्चित विचार है कि बदली हुई परिस्थिति में
वर्त्तमान बिहार सरकार को बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् को उसके मौलिक रूप में पुनः
परिवर्त्तित करना चाहिए | उसे वस्तुतः परिषद् का रूप देना चाहिए, न कि सरकारी
विभाग का | यह मैंने स्पष्टतः अपने पत्र में जयप्रकाश जी को लिखा है |”
फिर मैं २० अप्रैल, १९७८ को जयप्रकाश जी से मिला और माथुर
साहब के पत्र का स्मरण दिलाया तो उन्होंने मुझको आश्वस्त किया कि वे कर्पूरीजी से
बात करेंगे | लेकिन इसी बीच संवाद मिला कि १४ मई को माथुर साहब का निधन हो गया |
बाद में मैंने ४ नवम्बर,’७८ को स्मारक-संग्रहालय सम्बन्धी एक विस्तृत योजना मुख्यमंत्री को प्रतिवेदित
की | (इस पूरी योजना की प्रति ‘शिवपूजन सहाय साहित्य समग्र’ के खंड-५ में
पृ.५४८५-८७ पर प्रकाशित है, और वहां देखी
जा सकती है |) लेकिन एक बार फिर माथुर साहब के द्वारा मूल रूप में प्रस्तावित यह
महत्त्वपूर्ण साहित्यिक योजना सरकारी फाइलों में दफ़न होकर रह गई |
शिवजी ने माथुर साहब के विषय में ठीक ही लिखा था : “माथुर
साहब साहित्यिक अफसर हैं | प्रतिभाशाली और तेजस्वी, विनयशील भी |... सहृदय
साहित्यिक व्यक्ति हैं | कलात्मक और सांस्कृतिक सुरुचि है | सूझ-बूझ बड़ी बांकी है
|...आई.सी.एस. अफसरों में वही एकमात्र हिंदी-प्रेमी हैं | साहित्यिकों का समादर भी
करते हैं |”
श्री जगदीश चन्द्र माथुर और आचार्य शिवपूजन सहाय दोनों ही
सरस्वती-पुत्र थे | आज माथुर साहब के इस शती-जयंती वर्ष में और आचार्य शिवजी के
सपाद्शती जयंती वर्ष में इन दोनों साहित्य-मनीषियों के साहित्यिक साहचर्य-प्रसंगों
का स्मरण कुछ ऐसे शाश्वत साहित्यिक
मूल्यों और आदर्शों की ओर इंगित करता है जो साहित्य और समाज के लिए आज अत्यंत शुभकारी और प्राणदायी सिद्ध हो सकते हैं |
'आजकल' (सितम्बर, २०१८ ) में प्रकाशित
(C) Text & Photos: Dr BSM Murty
'आजकल' (सितम्बर, २०१८ ) में प्रकाशित
(C) Text & Photos: Dr BSM Murty
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२०१८ : साहित्यिक सामग्री
(आगे से पीछे के क्रम में)
# जगदीश चन्द्र माथुर:कुछ स्मृतियाँ (२०१८,
नवं. २६) # शिवपूजन सहाय की भोजपुरी कहानी
(२०१८, अगस्त १७) # शिवपूजन सहाय
और ‘हिमालय’ (२०१८ , जुलाई १७) # शिवपूजन सहाय और राहुल सांकृत्यायन (२०१८, जून
१२) # शिवपूजन सहाय: पुण्य-स्मरण
(मेरा व्याख्यान, राजभाषा विभाग, पटना : २०१८, जनवरी २४) # शिवपूजन सहाय की
प्रारम्भिक पद्य रचनाएँ (२०१७,नवं.८)
२०१७: श्रीमदभगवद गीता :
अध्याय: अंतिम-१८ ( २ नवं.) / १७ (२५ अक्तू.), १६ ( १८
अक्तू.), १५ (१२ अक्तू.), १४ (४ अक्तू.), १३ (२७ सितं.),१२ (१७ सितं.), ११ (७
सितं.), १० (३० अगस्त ), ९ (२३ अगस्त ), ८ (१६ अगस्त ), ७ (९ अगस्त), ६ (३ अगस्त),
५ (२८ जुल.),४ (२१ जुल.), ३ (१३ जुल.), २ (६ जुल.), प्रारम्भ : सुनो पार्थ -१ (२८ जून) |
२०१७ : रामचरितमानस :
२०१७ : २० जून : उत्तर काण्ड (उत्तरार्द्ध) समापन / १३ जून : उत्तर काण्ड (पूर्वार्द्ध) / ६ जून : लंका काण्ड (उत्तरार्द्ध) / ३० मई : लंका काण्ड (पूर्वार्द्ध) / २३ मई : सुन्दर
काण्ड (उत्तरार्द्ध) / १६ मई : सुन्दर काण्ड (पूर्वार्द्ध) / ९ मई :
किष्किन्धा काण्ड (सम्पूर्ण) / २ मई :
अरण्य काण्ड (कथा-सूत्र ५ – ७) / २४ अप्रैल : अरण्य काण्ड (कथा-सूत्र १ – ४) / १७ अप्रैल : अयोध्या काण्ड (कथा-सूत्र ६ – १०) / १० अप्रैल : अयोध्या काण्ड (कथा-सूत्र १ – ५) / १९ मार्च : मानस बालकाण्ड (६-१२, उसके नीचे १-५)
२०१७ : दुर्गा सप्तशती :
४ अप्रैल : (अध्याय ८ – १३) / २९ मार्च : (अध्याय १ – ७) / २८ मार्च : ( परिचय-प्रसंग)
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