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Monday, May 29, 2017

रामचरित मानस : पुनर्पाठ 

लंकाकाण्ड 
कथासूत्र -

लंकाकाण्ड में रावण की लंका में श्रीराम-रावण युद्ध का वर्णन है| समुद्र को पार करके युद्ध से पूर्व श्रीराम ने भारतवर्ष के दक्षिणी समुद्र-तट पर पहले शिवलिंग की स्थापना और पूजा करते हुए यह कहा था कि -

      करिहऊँ इहाँ संभु थापना,मोरे हृदयं परम कल्पना|
      लिंग थापि बिधिवत करि पूजा, सिव समान प्रिय मोहि न दूजा|१.२-३|

आज वही शिवलिंग हिन्दुओं के परम तीर्थ तमिलनाडु प्रांत के रामेश्वरम में स्थित है जो भारतवर्ष के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में गिना जाता है| भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना के बाद श्रीराम ने अपनी सेना के साथ नव-निर्मित पुल से  समुद्र को पार किया| वाल्मीकि  रामायण में – जो पूरी संस्कृत में है – इसी स्थल पर एक प्रसिद्द ‘आदित्य ह्रदय’  स्तोत्र है जिसके विषय में कहते हैं कि अगस्त्य ऋषि ने इसी अवसर पर यह मन्त्र श्रीराम को विजय-मन्त्र की तरह प्रदान किया था जिसका आज भी पाठ करने से हर प्रकार के शत्रु पर विजय प्राप्त की जा सकती है| इस शिवलिंग की स्थापना के बाद श्रीराम ने कहा –

      जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं, ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं|
      जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि, सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि|
      मम कृत सेतु जो दरसनु करिही, सो बिनु श्रम भवसागर तरिही| २.१-२|

आज भी रामेश्वरम जाने वाले तीर्थयात्री वहां समुद्र के बीच में दक्षिण की ओर बहुत से पत्थरों के टापुओं की एक श्रृंखला देख सकते हैं जिसे ‘रामेश्वर सेतु’ अथवा ‘राम-सेतु’ के नाम से जाना जाता है| इस सेतु से अपनी वानर-सेना के साथ समुद्र पार करने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना और सुग्रीव, अंगद, हनुमान आदि सेनापतियों के साथ लंका के सुबेल पर्वत पर अपना युद्ध का खेमा लगाया|

लंकाकाण्ड की कथा से पूर्व हम लंका और वहां के अधिपति रावण के विषय में कुछ और जान लें| बालकाण्ड के कथासूत्र ५ और ६ में रावण के पूर्व जन्मों (प्रतापभानु आदि) की कथा आ चुकी है| रावण सोमाली नामक राक्षस के राक्षस-कुल में पुलत्स्य के बेटे विश्रवा और कैकसी का पुत्र था| उसके दो और भाई कुम्भकर्ण और विभीषण भी थे| रावण का विवाह मय नामक  दानव की पुत्री मंदोदरी से हुआ था जिससे रावण के कई पुत्र थे जिनमें मेघनाद, अक्षय कुमार, प्रहस्त आदि का नाम कथा में प्रमुख रूप से आता है| रावण अपने सौतेले भाई कुबेर से - जो पहले लंकापति था – बहुत द्वेष करता था और उसकी समता करने के लिए उसने ब्रह्मा और शिव की घनघोर पूजा-तपस्या की थी, और उसी क्रम में अपने सर को बारम्बार काट-काटकर होम किया था जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसको अभयदान दिया था कि उसे दानव, यक्ष आदि कोई नहीं मार सकेगा और उसको केवल मानव से ही मृत्यु प्राप्त होने का डर रहेगा| अपने दानवी-बल से रावण ने अंततः तीनो लोकों पर विजय प्राप्त कर लिया और कुबेर से छीनकर ‘स्वर्णपुरी’ लंका को अपनी राजधानी बनाया था जो अपने वैभव और सुन्दरता के लिए सारे जग में विख्यात थी| रावण के ये सारे प्रसंग लंका-काण्ड में वर्णित हैं|

लंकाकाण्ड 
कथासूत्र -

श्रीराम अपनी वानर-सेना के साथ लंका में सुबेल पर्वत पर विराजमान थे| उस काल की युदध-नीति के अनुसार युद्ध प्रारम्भ होने से पहले शत्रु के पास अपने दूत द्वारा युद्ध का मार्ग त्यागने का शान्ति-सन्देश भेजा करते थे जिससे अनावश्यक रक्तपात से बचा जा सके| तदनुसार श्रीराम ने सबसे राय करके बालि को दूत के रूप में रावण के पास भेजने का निश्चय किया और बालि से कहा – ‘बालितनय बुधि बल गुन धामा,लंका जाहु तात मम कामा’| श्रीराम की आज्ञा पाकर – ‘बंदि चरन उर धरि प्रभुताई, अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई’|

इधर रावण के गुप्तचरों ने आकर श्रीराम के सुबेल पर्वत पर अपना खेमा लगाने का समाचार रावण-दरबार में सुनाया| तब हनुमान के लंका-दहन से अत्यंत भयभीत मंदोदरी ने रावण को बहुत तरह से समझाने और सीता को लौटा देने की सलाह  देने की कोशिश की और आँखों में आंसू भरकर विनती की –

      रामहि सौंपि जानकी, नाइ कमल पद माथ|
      सुत कहुं राज समर्पि बन, जाइ भजिअ रघुनाथ|६|

रावण के पुत्र प्रहस्त आदि ने भी पिता को समझाने की बहुत चेष्टा की किन्तु रावण की बुद्धि तो विनाशकाल में विपरीत हो चुकी थी, वह भला किसी की नेक सलाह कैसे सुनता| सब को डांटते हुए वह अपने रंग-महल में चला गया और वहां नाच-गान देखने में मगन हो गया| उधर सुबेल पर्वत पर अपने सेनापतियों के साथ बैठे श्रीराम ने देखा कि दक्षिण दिशा में बहुत काले-काले बादल घिर आये हैं और उनमें कभी-कभी बिजली भी चमक उठती है | तभी विभीषण ने उन्हें बताया कि वह काला बादल और कुछ नहीं रावण स्वयं अपने रंग-महल में बैठा नाच-गान का आनंद ले रहा है और जो बिजली चमकती दीखती है वह वास्तव में मंदोदरी के कानों में झूलते कर्णफूल हैं जो कभी-कभी चमक उठते हैं| और बादलो का जो घोर गर्जन सुनाई पड़ रहा है वह तो ढोल-मृदंग के बजने की आवाज है| श्रीराम ने विभीषण की बात सुनकर सोचा कि रावण अपने मद में चूर अपने आगे आने वाली विपत्ति से बिलकुल बेखबर है| मुस्कुराते हुए श्रीराम ने अपने धनुष से एक वाण झूलते हुए कर्णफूल के उसी निशाने पर छोड़ा| उस एक ही वाण के लगते ही –

      छत्र मुकुट ताटंक तब, हते एक ही बान|
      सबकें देखत महि परे,मरमु न कोऊ जान|१३|

रावण के मुकुट और अपने कर्णफूलों को कटकर गिरते देखकर ही मंदोदरी को भयानक अपशकुन का संदेह हुआ और वह फिर बार-बार रावण को समझाने लगी| लेकिन रावण तो नृत्य और गान में इतना डूबा हुआ था कि उसपर मंदोदरी की सलाह का कोई असर ही नहीं हुआ| वह नृत्य और गान से अचानक उठकर अपने दरबार में चला गया|


लंकाकाण्ड 
कथासूत्र -

सुबेल पर्वत पर श्रीराम अपने सेनापतियों के साथ बैठे विचार-विमर्श कर रहे थे कि अब आगे की योजना क्या हो? रीछराज जाम्बवान ने सलाह दी थी कि पहले शांति का सन्देश लेकर बालि-पुत्र अंगद को दूत के रूप में रावण के दरबार में भेजा जाय| उसी के बाद  श्रीराम की आज्ञा पाकर बालिपुत्र अंगद दूत के रूप में रावण-दरबार की ओर चले थे | नगर में घुसते ही अंगद की भिडंत रावण के एक पुत्र से हो गयी| अंगद ने उसे एक ही पटकन में मार डाला| चारों ओर फिर हल्ला मचा कि लंका-नगरी में फिर एक बन्दर आ गया है| अंततः अंगद रावण की सभा में जा पहुंचे और मदांध रावण के परिचय पूछने पर कहा कि मैं श्रीरामजी का दूत अंगद हूँ| मैं तुम्हारे पूर्व-परिचित वानरराज बालि का पुत्र हूँ जिसने खेल-खेल में ही तुमको अपनी काँखों में बहुत दिन तक दबा कर रखा था, और तुम्हारे बहुत रोने-गिडगिडाने पर तुम्हें छोड़ा था| मैं अभी तुम्हारी और लंका की भलाई के लिए अपने स्वामी श्रीराम की ओर से  शांति का सन्देश लेकर आया हूँ| अब तुम्हारी और लंका की भी भलाई इसी में है कि तुम आदरपूर्वक माँ सीता को श्रीरामजी को लौटा दो और व्यर्थ युद्ध करके लंका का विनाश मत करवाओ| यह सुन कर रावण पहले तो अट्टहास करके हंसा लेकिन अपने पुत्र के वध की बात सुनते ही वह अत्यंत क्रुद्ध होकर बोला – अरे क्षुद्र बन्दर, तू इतना उत्पाती है कि तूने मेरे पुत्र का वध कर दिया? अब दूत बनकर तू मेरे दरबार में आया है तो अपनी यह बकवास तुरत बंद कर| लेकिन अंगद ने जैसे रावण को चिढाते हुए कहा कि - देख रावण मेरी ही तरह का एक बन्दर पहले आकर पूरी लंका को तबाह करके चला गया है, और तू कुछ भी नहीं कर सका| मैं जानता हूँ तेरा बल कितना है| मेरे पिता बालि ने तो दया करके तुझे छोड़ दिया था नहीं तो तुम्हें मार ही डालते| एक बार और जब सहस्त्रबाहु ने तुझे पकड़ लिया था तो तेरे पितामह पुलत्स्य ने तुझे छुडाया था, यह सब मैं जानता हूँ| तू व्यर्थ घमंड में अपनी जान मत दे| इस पर कड़ककर रावण बोला – अरे बन्दर तू क्या जानता है मेरा बल| मैंने तो अनेक बार अपना सर काट-काट कर शिवजी को चढ़ा दिया था और मुझको उनका अभयदान प्राप्त है, मैं – ‘ सोई रावन जग बिदित प्रतापी, सुनेहि  न श्रवन अलीक प्रलापी’|तू अपना यह झूठा प्रलाप और बकवास बंद कर और अपनी कुशल चाहता है तो अभी यहाँ से भाग जा| अंगद बोले कि – देख रावण, बुद्धि तो तेरी मारी गयी है| एक बार लंका का विनाश तू देख चुका है फिर भी तेरी बुद्धि नहीं सुधरी है| तू नहीं जानता, मैं अपने स्वामी के आदेश से बंधा न होता तो –

      तोहि पटकि महि सेन हति, चौपट करि तव गाऊँ|
      तव जुबतिन्ह समेत सठ, जनकसुतहि लै जाऊं|३०|

यह कहते हुए अंगद ने क्रोध में बड़े जोर से जमीन पर अपनी मुट्ठी से प्रहार किया जिससे वहां की धरती हिल गयी और रावण के कई मुकुट उसके सिर से नीचे गिर गए| अंगद ने तुरत उनमें से कुछ मुकुटों को बड़े जोर से श्रीराम की दिशा में फेंक दिया| क्रुद्ध होकर रावण ने अपने दरबारियों से कहा कि इस बन्दर को पकड़कर मार डालो| लेकिन दरबारियों ने कहा कि दूत को मारना नीति-विरुद्ध होगा| अंत में अंगद ने भी कुपित होकर पृथ्वी पर अपना एक पावं रोप कर कहा कि - अरे रावण! व्यर्थ बडबोली न दिखा| यह देख मैं यहाँ अपना पावँ रोप रहा हूँ; अगर तू इसको केवल हिला भी दे तो मैं यहाँ तक कहता हूँ कि मैं सीताजी को हारकर यहाँ से चुपचाप चला जाऊंगा| इस पर रावण ने अपने दरबारियों से कहा कि देखो इस बन्दर की टांग तोड़ ही दो तब यह लंगडाते हुए यहाँ से जायेगा| लेकिन जब एक-एक कर सभी दरबारी अंगद के पावँ को टस-से-मस भी नहीं कर सके तब रावण अपने मुकुट संभालता अपने सिंहासन से उतरा और अंगद के पावं उखाड़ने चला| लेकिन जैसे ही उसने अंगद का पावं पकड़ा, अंगद हंसकर बोले –

      गहत चरन कहि बालिकुमारा, मम पद गहें न तोर उबारा|
      गहसि न राम चरन सठ जाई, सुनत फिरा मन अति सकुचाई|३४.१-२|

रावण बिलकुल लज्जित होकर उदास अपने सिंहासन पर जा बैठा और गंभीर चिंता  में डूब गया| इसी समय रावण का घमंड चूर करके अंगद भी श्रीराम की शरण में लौट आये|               
 

लंकाकाण्ड 
कथासूत्र -
घमंड और विनम्रता परस्पर विरोधी वृत्तियाँ हैं| रावण द्वारा अंगद का पैर पकड़ना एक प्रतीक है| रावण अपने घमंड में चूर होकर अंगद को पछाड़ने की नीयत से अंगद के पैर पकड़ने चला था| लेकिन यहाँ अंगद का सन्देश यह था कि रावण को अपना घमंड त्याग कर विनम्र भाव से श्रीराम के आगे आत्म-समर्पण करना चाहिए था| जब अंगद ने कहा – ‘गहसि न राम चरन सठ जाई’ – अरे मूर्ख रावण! तू श्रीराम के चरण जाकर क्यों नहीं पकड़ता| तब अत्यन्य लज्जित होकर रावण दरबार से उठ कर अपने महल में चला गया| यह रावण की पराजय का एक प्रतीकात्मक पूर्वाभास था| घमंड का इसी प्रकार चूर होना अनिवार्य है|

लज्जित होकर जब रावण अपने रंग-महल में गया तो वहां उसकी पत्नी मंदोदरी    ने भी उसको तरह-तरह से ताने मारकर समझाने की बहुत कोशिश की|

     प्रिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा, जाके दूत केर यह कामा|...
     जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा, कहाँ रहा बल गर्व तुम्हारा|...
     पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु, अग जग नाथ अतुलबल जानहु|३५.२-४|

मंदोदरी ने कहा कि जिसने खर-दूषण,शूर्पणखा, कबंध, विराध आदि की ऐसी दुर्दशा की और मार डाला, और जिसके दूतों ने आपका सारा घमंड चूर-चूर कर दिया उसको आप युद्ध में कैसे जीत सकते हैं? इसीलिए कहते हैं कि – ‘निकट काल जेहि आवत साईं, तेहि भ्रम होई तुम्हारिहि नाईं’| लेकिन यह सब सुन कर भी रावण की बुद्धि नहीं सुधरी| क्योंकि उसका विनाश-काल अब अत्यंत निकट आ चुका था|

इधर जब अंगद लौटकर श्रीराम के पास पहुंचे तो श्रीराम ने हंसकर उनसे पूछा – अरे अंगद, तुमने वहां से रावण के ये चार मुकुट मेरे पास क्यों फेंके? अंगद ने कहा – हे प्रभु! ये चार मुकुट रावण की चार शक्तियां – साम, दाम, दंड, भेद - हैं जो उसके पास राजबल की तरह सुरक्षित थीं, जो अब उसको छोड़कर आपके पास आ गई हैं| हर राजा के पास ये चार प्रमुख शक्तियां होती हैं : साम – प्रजा को प्रभावित करने की शक्ति, दाम अर्थात शासन की शक्ति, दण्डित करने की शक्ति और कूटनीति की शक्ति| रावण अब इनसे रहित होकर पहले ही पराजित हो चुका है| अब युद्ध में उसकी हार तो एक औपचारिकता-मात्र रह गयी है|

इसके बाद श्रीराम ने अपने मंत्रियों के साथ युद्ध की रणनीति बनायी और लंका के किले के चार द्वारों के लिए चार सेनापति नियुक्त कर दिए| जब श्रीराम की विशाल वानर सेना ने लंका के किले पर आक्रमण शुरू किया तब पूरी लंका में कोहराम मच गया| दोनों ओर से घनघोर लड़ाई शुरू हो गयी| तुलसीदास ने बड़े विस्तार से इस भयंकर युद्ध का वर्णन किया है और यह वर्णन लम्बा चला है| किले के चारों दरवाजों पर राक्षसों और वानर-सेना के बीच यह युद्ध चलता रहा, लेकिन यहीं पश्चिमी दरवाजे पर हनुमान और मेघनाद के युद्ध का वर्णन आया  है जिसमें पहले मेघनाद घायल होता है और बाद में लौटकर वह अपने भयंकर शक्ति-वाण से लक्ष्मण को आहत करता है जिससे लक्ष्मण मूर्च्छित हो जाते हैं| इसकी कथा अगली श्रृंखला

में दी गयी है|           


|| लंकाकाण्ड : उत्तरार्ध अगले मंगलवार को पढ़ें ||

इस ब्लॉग पर उपलब्ध पूर्व सामग्री का विवरण

२०१७
३० मई : लंका काण्ड (पूर्वार्द्ध)
२३ मई : सुन्दर काण्ड (उत्तरार्ध)
१६ मई : सुन्दर काण्ड (पूर्वार्द्ध)
९ मई : किष्किन्धा काण्ड (सम्पूर्ण)
२ मई : अरण्य काण्ड (कथा-सूत्र ५ – ७)
२४ अप्रैल : अरण्य काण्ड (कथा-सूत्र १ – ४)
१७ अप्रैल : अयोध्या काण्ड (कथा-सूत्र ६ – १०)
१० अप्रैल : अयोध्या काण्ड (कथा-सूत्र १ – ५)
४ अप्रैल : दुर्गा सप्तशती (अध्याय ८ – १३)
२९ मार्च : दुर्गा सप्तशती (अध्याय १ – ७)
२८ मार्च : दुर्गा सप्तशती ( परिचय-प्रसंग)
१९ मार्च : मानस बालकाण्ड (६-१२उसके नीचे १-५)

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