डा. कमल किशोर गोयनका का साथ
मंगलमूर्त्ति
[डा. कमल किशोर गोयनका का निधन हिंदी के शोध-साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है |
उन्होंने अपना पूरा जीवन प्रेमचंद शोध को समर्पित कर दिया था, और उस क्षेत्र में
उनकी उपलब्धियां चिरस्मरणीय रहेंगी | डा. गोयनका से मेरा सुदीर्घ रचनात्मक सम्बन्ध
रहा | अभी कुछ दिन पहले उनसे फोन पर बातें भी हुईं थीं | पत्राचार तो ६०-७० के दशक
से ही बराबर चलता रहा | प्रेमचंद के शती-वर्ष (१९८०) में उनको मैंने मुंगेर में एक
२-दिवसीय शती-आयोजन में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था, जिसमें मेरे
पिता के सहकर्मी, और कुछ दिन पूर्व में आर.डी.डी.जे. कॉलेज मुंगेर के प्रिंसिपल भी
रहे, श्री केसरी किशोर शरण अध्यक्षता के लिए आमंत्रित थे (जिन्हें १९३० में प्रेमचंद को पहली बार पटना बुलाने का सौभाग्य
प्राप्त हुआ था) | उस अवसर पर मुंगेर श्री कृष्ण सेवा सदन में मैंने यह विशेष
शती-पर्व आयोजित किया था जिसमें डा. गोयनका के सहयोग से प्रेमचन-सामग्री की एक
सुन्दर प्रदर्शनी भी लगाईं गई थी, और ‘कफ़न’ का नाट्य-प्रदर्शन भी डी.जे. कॉलेज राष्ट्रीय सेवा योजना
के स्वयंसेवकों ने प्रस्तुत किया था | उस अवसर के कुछ चित्र यहाँ इसी ब्लॉग पर आगे चल कर लगे देखे जा
सकते हैं | और यहाँ पढ़िए महात्मा गाँधी वि.वि.,वर्धा की पत्रिका ‘बहुवचन’ (अप्रैल-सितं.
२०१९) में प्रकाशित डा. गोयनका पर मेरा संस्मरण जिसमें वो सारी यादें दुहरायी गई
हैं | इस ब्लॉग-पोस्ट द्वारा डा. गोयनका को मेरी यह अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि
समर्पित है |]
साथ साहित्य-पथ पर डा. गोयनका के साथ-साथ चलने का ! साथ जीवन-यापन (प्राध्यापन) में, व्यसन (साहित्य-पाठ.
साहित्य-लेखन) में और लोक-व्यवहार में – कई दशकों तक के एक जैसे जीवन-प्रवाह का !
कोई संपर्क, कोई साहचर्य, कोई आत्मीयता
इतनी मधुर और सार्थक नहीं हो सकती जितना एक साहित्यिक-सख्यभाव ! डा. गोयनका से
मेरा साथ लम्बे समय का रहा है, और कुछ ऐसा ही रहा है | उनसे मेरा पहला परिचय सत्तर के दशक में सामान्य
पत्राचार से ही शुरू हुआ था, और धीरे-धीरे वह साहचर्य परस्पर स्नेह और सम्मान-भाव में ढलता गया | कुछ
तो अपनी आजीविका की अभिरुचियों के अनुरूप और कुछ अपने संपोषित साहित्यिक संस्कारों
के कारण यह संपर्क समय के साथ दृढतर होता गया | यहाँ कुछ पुरानी स्मृतियों को
दुहराने से इनके सूत्र पूरी तरह स्पष्ट होंगे |
साठ के दशक के प्रारम्भ में मेरे पिता (आ. शिवपूजन सहाय) का
निधन हुआ था, और कई समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं ने उन पर स्मृति-विशेषांक निकाले
थे, और एक बार श्रद्धा-सुमन-अर्पण के रूप में समस्त हिंदी-जगत का ध्यान उन पर
केन्द्रित हो गया था, जिसमें पुरानी पीढ़ी के साथ-साथ नई पीढ़ीके साहित्यकार भी बड़ी संख्या में थे | मेरे
पिता (जो हिन्दी-जगत में ‘शिवजी’ के नाम से जाने जाते थे ) अपनी पारिवारिक विरासत
के रूप में अपने गाँव पर एक बहुत बड़ा पुस्तकालय और अनेक प्रकार की बहुमूल्य
साहित्यिक सामग्री – अपनी डायरियां, पांडुलिपियाँ, हजारों की संख्या में
साहित्यकारों के पत्र, चित्र आदि छोड़ गए
थे | तब मैं कॉलेज में पढ़ाने लगा था, और
सदा अपने पिता के साथ उनके साहित्यिक संग्रहालय की देख-भाल में उनके साथ लगा रहने
के कारण, अब इस सारी अतिशय मूल्यवान साहित्यिक सामग्री की देख-रेख के प्रति
स्वाभाविक रूप से समर्पित हो चुका था |
अपने अंतिम दिनों में, १९६० की गर्मियों में जब मेरा कॉलेज
भी बंद था, लगभग एक महीने गाँव पर रह कर
मेरे पिता गाँव के पुस्तकालय में पुस्तकों को व्यवस्थित करते रहे और ६-७ बोरों में बंद चिट्ठियों में से
उन्होंने दो बोरे चिट्ठियां छांटीं जो फिर
पटना लायी गयीं | पुस्तकालय की साफ-सफाई में और चिट्ठियां छांटने में मैं बराबर उनके साथ लगा रहता था, फिर भी वे घुटनों
पर बैठे, गर्द-गुबार में लथ-पथ, सुबह से शाम तक इसी काम में लगे रहते | पटना लाने
के बाद भी वे अंत-अंत तक उन चिट्ठियों को अलग-अलग लिफाफों में छांट-छांट कर रखते
गए थे | यह वही समय था जब डा. रामविलास शर्मा, उन चिट्ठियों के व्यवस्थित होने के
क्रम में, पटना आये थे, जब वे ‘निराला की साहित्य-साधना’ पर काम कर रहे थे और
‘मतवाला’-मंडल से सम्बद्ध कुछ पत्रों को
मेरे पिता से मांग कर ले गए थे (जिन्हें फिर लौटाया भी था) | उस समय मैं भी अपनी
छुट्टियों में आया हुआ था और डा. साहब की सहायता कर रहा था | बाद में प्रकाशित
होने पर उन्होंने उस पुस्तक के तीसरे पत्र-खंड की एक प्रति हस्ताक्षरित कर मुझे
आगरा में भेंट दी थी, जो मेरे लिए एक थाती रह गयी है | यह एक मनोरंजक संयोग है कि इस
संस्मरण में रामविलासजी का उल्लेख स्वतः प्रसंगवश आ गया | पुरानी चिट्ठियां स्वयं
ही पुरानी स्मृतियों को एक श्रृंखला में जोड़ देती हैं !
मेरे पिता का निधन रामविलासजी के आगमन के कुछ ही दिन बाद जनवरी,
१९६३ में हो गया था और उनके निधन के बाद उन चिट्ठियों की एक विस्तृत सूची बनी थी
जिसे हमलोगों ने ‘साहित्य’ के ‘शिवपूजन-स्मृति-अंक’ (जन., १९६४) में प्रकाशित करा दिया था | इस सूची में शिवजी
के पुराने और समकालीन साहित्यकारों के लगभग ७,५०० पत्र थे, जिन्हें बाद में नेहरु
संग्रहालय, दिल्ली को भेज दिया गया | कालांतर में गाँव के उस पुस्तकालय में
संगृहीत-संचित पत्रिकाओं को भी वहीँ भेज दिया गया, जहाँ उनकी माइक्रोफिश और माइक्रोफिल्म भी अब उपलब्ध
हैं | पुस्तकालय का सम्पूर्ण पुस्तक-संग्रह भी बाद में पटना के गांधी संग्रहालय
में सुरक्षित रखवा दिया गया | इस प्रकार शिवजी के आजीवन-संग्रह की पूरी साहित्यिक
सामग्री अब पूर्णतः सुरक्षित तो है ही, शोध के लिए भी सुलभ है | मैंने भी अगली
पीढ़ियों के लिए इस बहुमूल्य साहित्यिक सामग्री के सुरक्षित रख-रखाव को अपने
कार्यकारी जीवन में सर्वोच्च प्राथमिकता दी, और इसे पिता की दी हुई जिम्मेदारी के
निर्वहन से प्राप्त होने वाले सुख-संतोष की तरह स्वीकार किया | इसी दायित्त्व-भाव
के अंतर्गत लगभग तीन दशकों (१९९०-२०१०) के श्रम के फलस्वरूप ‘शिवपूजन सहाय
साहित्य-समग्र’(१० खंड) का प्रकाशन भी हुआ, जिसके विषय में ‘समग्र’ के लोकार्पण
में नामवरजी ने आशीर्वाद स्वरूप कहा कि इस महत्त्वपूर्ण कार्य से मैं ‘पितृ-ऋण’ से
उऋण हो गया | यद्यपि सम्मानपूर्वक शिरोधार्य करते हुए भी मैं ऐसा नहीं मानता | क्योंकि
न तो ‘पितृ-ऋण’ जैसा कोई ऋण होता है, और न
कोई उससे उऋण ही हो सकता है !
मेरे पिता के साहित्यिक पत्रों का यह सुदीर्घ प्रसंग ऐसा था
जिसके क्रम में ही श्रीगोयनका से भी मेरा संपर्क सत्तर के दशक में हुआ, जब मैं इस
पत्र-संग्रह के आधार पर प्रेमचंद पर केन्द्रित एक पत्र-संग्रह के सम्पादन में
संलग्न था | तब मैं भागलपुर विश्वविद्यालय के मुंगेर-स्थित एक कॉलेज में अंग्रेजी का प्राध्यापक था, और
इन्हीं दिनों मैं अपने पीएच. डी. शोध में भी पूरी तरह व्यस्त था | मेरे द्वारा
संपादित पुस्तक ‘प्रेमचंद पत्रों में’
(जिसका पहला संस्करण १९९२ में ‘प्रेमचंद: पत्र-प्रसंग’ शीर्षक से प्रकाशित
हुआ था) की तैयारी में भी मैं इन्हीं दिनों लगा था, और उस क्रम में पत्रों और फोन
से मेरा संपर्क श्रीगोयनका से बराबर हुआ करता था, क्योंकि वे भी उन्हीं दिनों अपने
प्रेमचंद-सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण शोध में लगे हुए थे | उनके साथ के मेरे पत्राचार में से बहुत सारे पत्र तो गुम होते रहे – जैसा मेरे पिता के साथ भी हुआ था, जो बराबर
किराये के मकान बदलते ही रहे, कुल सात शहरों में, और खुद मैनें भी कुछ आधा दर्ज़न
शहरों में किराए के मकान तो बदले ही, जिनमें न जाने कितना कुछ खोया – लेकिन बहुत
सावधानी बरतने के कारण मेरे पास भी कुछ महत्त्वपूर्ण लोगों के पत्र बचे रहे जिनमें
गोयनकाजी के भी कुछ पत्र हैं, और कुछ रामविलासजी के भी हैं |
उन बचे हुए पत्रों के इस पहले पत्र (अक्तू.’८४) से, पूर्व से
चल रहे पत्राचार और संपर्क का कुछ अंदाज़ मिल जाता है : “आपको फोन किया तब ज्ञात
हुआ की आप मुंगेर चले गए | पिताजी के जयशंकर प्रसाद पर लिखे संस्मरण के सम्बन्ध
में आपको पत्र लिखा था...उसे संकलित करने की अनुमति प्रदान करें |”
पत्रों में छोटी-छोटी सूचनाएं होती हैं, जिनसे घटनाओं के
समय-निर्धारण में सहायता मिलती है | आज यही काम मोबाइल मेसेज और सीसी कैमरों से
लिया जा रहा है | पत्रों का तो एक प्रकार से युग ही समाप्त हो गया, और उसके साथ
समाप्त हो गया संवेदना और सौहार्द का एक संसार ही ! श्रीगोयनका का एक पत्र मार्च,
’८५ का है, जब वे जाकिर हुसैन इवनिंग कॉलेज में कार्यरत थे : “आप दिल्ली आने वाले
थे, लेकिन आप आए तो होंगे, परन्तु आपसे संपर्क न हो सका |...विश्वास है आपका कार्य
सुचारू रूप से चल रहा होगा | इधर प्रेमचंद
के पाठ पर कार्य कर रहा हूँ – पाठ-भेद बहुत है प्रेमचंद की कृतियों में | आपके पास
प्रेमचंद के प्रथम संस्करण हैं?... आपके पास प्रेमचंद के प्रथम संस्करण किन-किन
पुस्तकों के हैं, कृपया यह भी लिखें |...मैं आपको यदा-कदा कष्ट देता रहता हूँ,
परन्तु क्या करूं जिनपर अपना हक़ मानता हूँ, उनसे ही अपनी बात कह सकता हूँ |”
साल-भर बाद के एक और पत्र (५.८.८६) में फिर ऐसा ही प्रसंग है: “इधर प्रेमचंद
रचनावली’ पर काम कर रहा हूँ | यह २० खण्डों में होगी | इसके लिए मुझे प्रेमचंद की
पुस्तकों के प्रथम संस्करण चाहिए | कुछ तलाश कर लिए हैं और कुछ की तलाश है
|...शिवपूजनजी के संग्रहालय में प्रेमचंद की पुस्तकें होंगी, ‘हंस’ तथा ‘जागरण’ के
अंक होंगे | आप इसमें मेरी क्या मदद कर सकेंगे?”
इन्हीं दिनों मैं प्रेमचंद से सम्बद्ध पत्रों के अपने संकलन
के सम्पादन में लगा था और पत्र से तथा फोन से भी गोयनकाजी से संपर्क बना रहता था |
पिताजी के पत्र-संग्रह में प्रवासीलाल वर्मा के १२१ पत्र थे | प्रवासीलाल वर्मा
मुद्रणकला के विशेषग्य माने जाते थे, और मेरे पिता के प्रयास से ही प्रेमचंदजी के
‘सरस्वती’ प्रेस के प्रबंधन का कार्य संभालते थे | लेन-देन को लेकर दोनों के बीच
कुछ बखेड़ा हो गया था, जिसमें शिवजी ने भी बीच-बचाव किया था | बात गांधीजी तक चली
गयी थी | इस प्रसंग में मैंने गोयनका जी को जानकारी के लिए लिखा तो उन्होंने
स्पष्टीकरण भेजा : “प्रेमचंद ने दिसंबर, १९३५ में प्रवासीलाल वर्मा को ९०० रु. का
गबन करने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया था | दोनों पक्षों की सहमति से पंच भी
नियुक्त हुए थे और प्रवासीलाल वर्मा ने सारा मामला महात्मा गाँधी को लिख कर भेजा
था और न्याय माँगा था | मेरे पास १८ जुलाई, १९३६ का महादेव देसाई का पत्र है
जिसमें उन्होंने प्रवासीलाल वर्मा के पत्र प्राप्त होने की सूचना दी है तथा
महात्मा गाँधी द्वारा शीघ्र उत्तर देने के लिए लिखा है | महात्मा गाँधी ने क्या
निर्णय दिया यह अज्ञात है |” ध्यातव्य है की इस प्रसंग में मेरी ‘प्रेमचंद पत्रों
में’ पुस्तक में प्रवासीलाल वर्मा के लगभग ३ दर्ज़न पत्र प्रकाशित हैं जिनसे
प्रेमचंद और प्रवासीलाल वर्मा के बीच के संबंधों पर अतिरिक्त प्रकाश पड़ता है, और श्रीगोयनका
की बहुत सी बातों की पुष्टि भी होती है |
अब यह एक दीगर प्रश्न है कि प्रेमचंद के व्यक्तिगत जीवन में
उन तथ्यों का क्या महत्त्व है, और उन ज्ञात तथ्यों का, जो साक्ष्य के आधार पर
अकाट्य हैं, प्रेमचंद के रचना-अनुशीलन में किस हद तक प्रयोग किया जा सकता है अथवा
नहीं किया जाना चाहिए; या यह कहना चाहिए कि, वास्तव में, साहित्यानुशीलन में उन
जीवन-तथ्यों का महत्त्व नगण्य ही माना जा सकता है और इसीलिए तथ्यों को तथ्यों की
तरह ही देखा जाना चाहिए | प्रेमचंद का जीवन गरीबी और संघर्ष में बीता यह तो उस समय
के लगभग सभी ऐसे हिंदी लेखकों के विषय में ज्ञात है जो सब ‘कलम के मज़दूर’ ही रहे,
लेकिन उन दिनों, जब देश की उस समय की परिस्थितियों में जालियांवाला बाग़ का नरसंहार
आँखों के सामने हो और गाँधी की अहिंसात्मक क्रांति पूरे देश में नया अलख जगा रही
हो, उस समय का कोई साधारण मसिजीवी लेखक
केवल इसी कारण हालिया रूसी क्रांति से प्रभावित होकर अपने लेखन में साम्यवादी
विचारधारा से अनिवार्यतः प्लावित हो जायेगा, ऐसा
तय मान कर ही उसके रचना-कर्म का
अनुशीलन किया जा सकता है, अथवा किया जाना चाहिए, ऐसा तर्क स्वयं-सिद्ध नहीं माना
जा सकता | वस्तुतः तो साहित्यानुशीलन में किसी तरह का पूर्वाग्रह स्वीकार्य ही
नहीं होता, यह साहित्यानुशीलन का एक सामान्य सिद्धांत है | इस तरह का एक प्रसंग
गोयनका जी के एक प्रकाशित लेख ‘प्रेमचंद: डा. रामविलास शर्मा और मैं’
(साक्ष्य,मार्च,२००७) में पढ़ने को मिलता है | उस लम्बे लेख में गोयनका जी ने
रामविलासजी द्वारा प्रेमचंद की साम्यवाद-आधारित समालोचना के तर्कों को खारिज किया
है | साम्यवाद के प्रति आकर्षित होना या उसके प्रति सहानुभूतिशील होना और अपने
सृजन-कर्म को पूर्णतः साम्यवाद की विचारधारा से अभिसिक्त कर देना – दोनों अलग-अलग
बातें हैं | फिर भी गोयनका जी का इस विचारधारा से विरोध है, यह महत्त्वपूर्ण नहीं
है; महत्त्वपूर्ण यह है कि प्रेमचंद के सम्पूर्ण रचना-कर्म को इसी विचारधारा से
प्रेरित माना जाना चाहिए अथवा नहीं | मुझे यह पूरा विवाद प्रेमचंद के रचना-कर्म के
परिप्रेक्ष्य में अप्रासंगिक लगता है | एक लेखक अपने जीवन-दर्शन में कई विरोधी
विचारधाराओं से प्रभावित दिखाई दे सकता है, लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है विचारधाराओं
का यह प्रवाह उसके रचना-कर्म को किस हद तक प्रभावित करता है |
फिर भी, वह जो हो, मेरा संपर्क गोयनका जी से बना रहा,
क्योंकि मेरी अभिरुचि विचारधाराओं के इस संघर्ष में नहीं रही है | जब प्रेमचंद के
१२५ वीं जयंती-वर्ष में मेरी संपादित
पुस्तक ‘प्रेमचंद पत्रों में’(२००५) अपने
नए संस्करण में प्रकाशित हुई तब एक बार फिर गोयनकाजी से मेरा सघन पत्राचार तथ्यों
की प्रामाणिकता को लेकर हुआ | प्रवासीलाल वर्मा वाले प्रसंग में उन्होंने कुछ
नव-उद्घाटित तथ्यों से मुझे परिचित कराया और उसके लिए मैंने उनके प्रति अपनी पुस्तक की ‘प्रस्तावना’ में विशेष आभार प्रकट किया, क्योंकि इस बीच उन्होंने
प्रेमचंद से सम्बंधित बहुत सारी अप्राप्य सामग्री प्राप्त कर ली थी और ‘प्रेमचंद
का अप्राप्य साहित्य’ के दो खण्डों में उन्हें प्रकाशित किया था, जिनमें से लगभग
४० नए पत्रों को ‘प्रेमचंद पत्रों में’ पुस्तक में मैंने साभार सम्मिलित किया था |
अपने आभार-वक्तव्य में मैंने लिखा: “ (इस नए संस्करण में) चालीस पत्र वैसे
प्रकाशित हो रहे हैं जिन्हें डा. कमलकिशोर गोयनका ने बड़े परिश्रम से वर्षों की
खोज-ढूंढ और दौड़-धूप के बाद इकठ्ठा किया और अपनी पुस्तक के दूसरे खंड में अन्य
अत्यधिक बहुमूल्य सामग्री के साथ प्रकाशित किया |...उन्होंने ‘प्रेमचंद का
अप्राप्य साहित्य’ में प्रकाशित इन पत्रों को इस पुस्तक में सम्मिलित करने की
कृपापूर्ण अनुमति दी है | मैं एतदर्थ उनका विशेष आभार मानता हूँ | ऐसा उन्होंने
निश्चय ही प्रेमचंद के साहित्य के प्रति अपनी समर्पण-भावना से प्रेरित होकर किया
है | मैं उनकी इस उदारता से विशेष प्रभावित होकर उन्हें साधुवाद देता हूँ |”
इन उद्धरणों से इतना तो स्पष्ट होगा कि गोयनकाजी के साथ मेरा
सम्बन्ध शुद्ध साहित्यिक प्रयोजनों को लेकर ही था | यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि
हमारे परस्पर सम्बन्ध पूरी तरह विश्वास और सौहार्द पर ही आधारित थे | हम एक दूसरे
के साथ इन साहित्यिक कार्यों में पूर्ण सहयोग करते थे, और एक दूसरे की कार्य-शैली
का सम्मान करते थे | मैं उनके
प्रेमचंद-सम्बन्धी सघन शोध-कार्य का प्रशंसक रहा और, जैसा मैं कह चुका, मेरी
दिलचस्पी कभी सृजनात्मक साहित्य के राजनीतिक रुझान में नहीं रही है | मैं
साहित्य-पथ पर चलते हुए कभी दायें-बाएं
देखने में विश्वास नहीं करता | गोयनकाजी के साथ प्रेमचंद के समालोचनात्मक अनुशीलन
को लेकर ऐसे जो कुछ विवाद बने रहे हैं, उनको मैं समालोचन के लोकतंत्र के लिए
अभिनंदनीय ही मानता हूँ |
इन दशकों में कई-कई बार मेरा उनके साथ दिल्ली में मिलना भी
होता रहा – कभी उनके आवास पर, कभी कनाट प्लेस के कॉफ़ी हाउस में, कभी साहित्य
अकादमी में, और हम ज्यादातर उनके कार्य की प्रगति के विषय में ही बातें करते रहे |
लेकिन हमारी सबसे यादगार और लम्बी मुलाक़ात हुई थी, इससे कई वर्ष पहले मुंगेर में
ही, जब प्रेमचंद के जन्म-शती वर्ष (१९८०) में मैंने मुंगेर की साहित्यिक संस्था
‘विभावरी’ के अंतर्गत द्विदिवसीय ‘प्रेमचंद जन्मशती’ का आयोजन किया था जिसमें
गोयनकाजी को प्रेमचंद-साहित्य के एक विशेषग्य के रूप में विशिष्ट अतिथि के रूप में मुंगेर आमंत्रित किया
था | वहां उन्होंने अपने मुख्य भाषण में विस्तार से प्रेमचंद के जीवन और कृतित्त्व
पर विशद प्रकाश डाला था, और बहुत सी ऐसी अज्ञात बातें बताई थीं जिन्हें सुनकर सभी
श्रोता अत्यंत प्रभावित हुए थे, तथा छात्रों ने उनसे कई प्रासंगिक प्रश्न भी पूछे
थे | उन दो दिनों के घनिष्ठ संपर्क में
प्रेमचंद-साहित्य पर श्रीगोयनका के साथ मेरी भी बहुत-सी अन्तरंग और रोचक बातें हुई
थीं, जिनसे बहुत-सी उलझनें दूर हुई थीं |
एक भिन्न प्रसंग पाठालोचन से सम्बद्ध भी महत्त्वपूर्ण रहा |
वह था मेरे पिता द्वारा ‘रंगभूमि’ के सम्पादन
का | इस सम्बन्ध में मेरा एक लेख ‘रंगभूमि की पाण्डुलिपि’
प्रेमचंद-शती-प्रसंग में ‘परिषद् पत्रिका’ (व.२०,अं.२) में प्रकाशित हुआ था |
शिवजी दुलारेलाल के बार-बार बुलावे पर कलकत्ता ‘मतवाला’-मंडल से अलग होकर
गंगा-पुस्तकमाला के सम्पादकीय विभाग में काम करने अप्रैल, १९२४ में लखनऊ चले आये थे, और इसी समय प्रेमचंद की
‘रंगभूमि’ दुलारेलाल के यहाँ प्रकाशन के लिए आई थी, जो शिवजी को सम्पादन के लिए दी
गयी थी | ‘प्रेमचंद पत्रों में’ दुलारेलाल के पत्रों से स्पष्ट होता है कि सम्पादन
के क्रम में शिवजी वह पाण्डुलिपि सितम्बर, १९२४ में लखनऊ के दंगे में अपने होटल
में छोड़ कर अपने गाँव भागे थे और बाद में दुलारेलाल ने वह पांडुलिपि उस होटल से मंगा
ली थी | सितम्बर में ही प्रेमचंद अपनी मुश्किलों में दुलारेलाल के यहाँ
गंगा-पुस्तकमाला में साहित्यिक सलाहकार की
नौकरी पर लखनऊ आये थे | शिवजी भी नवम्बर
में फिर लौट कर लखनऊ आ गए थे, जब ‘रंगभूमि’ छपने लगी थी. और अंततः फरवरी, १९२५ में ‘रंगभूमि’ प्रकाशित हो गई थी |
प्रेमचंद ने उसकी पहली प्रति जो शिवजी को भेंट की उस पर २२ फरवरी, १९२५ की तिथि
अंकित है | दुलारेलाल भार्गव के गंगा-पुस्तकमाला प्रकाशन की जो भी पुस्तकें छपती
थीं उनमें वर्त्तनी आदि की एक ‘स्टाइल-शीट’ के कुछ निश्चित नियम थे, और जो भी छपता
था सम्पादक विभाग के लोग – जिनमें शिवजी प्रमुख थे – उसी के अनुसार पांडुलिपियों
की अलग से ‘प्रेस-कॉपी’ तैयार करते थे | ‘रंगभूमि’ की पाण्डुलिपि के साथ भी खास
तौर से ऐसा ही हुआ था | शिवजी ने मूल
पांडुलिपि पर कोई संशोधन नहीं किया था और उसकी
‘प्रेस कापी’ पर ही सारा संशोधन हुआ था, जैसा उनके प्रेमचंद वाले संस्मरण में लिखा भी है | वहां पूरा सन्दर्भ इस प्रकार वर्णित है:
“उनसे घनिष्ठता बढ़ने का सुयोग मिला लखनऊ में, जब मैं
‘मतवाला’-मंडल से ‘माधुरी’ के सम्पादकीय विभाग में गया | कुछ दिनों बाद वे भी
‘माधुरी’ के सम्पादक होकर आये | श्रीदुलारेलाल भार्गव ने कृपापूर्वक पत्रिका के
अतिरिक्त कुछ पुस्तकों के संशोधन का काम
भी मुझे दिया |...भार्गवजी मेरी सेवा से संतुष्ट हुए और मुझे प्रेमचंद के
सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘रंगभूमि’ की पांडुलिपि प्राप्त हुई, जो पहले से भार्गवजी
के पास आ चुकी थी |...जब ‘रंगभूमि’ की कापी मिली, मेरे आश्चर्य और आनंद का
ठिकाना न रहा | सारी कापी प्रेमचंदजी
की ही लिखी हुई थी | दो मोती जिल्दों में ख़ासा एक बड़ा पोथा, छोटे-छोटे अक्षर, घनी
लिखावट, कहीं काट-छांट नहीं; मानो पूरी पुस्तक एक सांस में लिखी गयी हो |...
भार्गवजी की गंगा-पुस्तक-माला की पुस्तकों का सम्पादन जिन नियमों के अनुसार
होता था, उन नियमों को मैं जान चुका था; क्योंकि भार्गवजी के संपादकत्व के
कारण ‘माधुरी’ में भी उन्हीं नियमों का पालन करना पड़ता था |... (‘रंगभूमि’
में) कुछ हिंदी-शब्दों की लिखावट में भूल मिलती थी और कुछ के उपयुक्त प्रयोग
में भी |...वाक्यावली और वर्णन-शैली तो गंगा की धारा-सी स्वच्छ और सवेग थी | बंधे
नियमों के अनुसार कुछ अक्षर बदलने पड़े | कुछ मात्राएँ इधर-उधर हुईं, कुछ
प्रसंगानुकूल यथोचित शब्द चस्पां किये गए | प्रेस-कापी तैयार हो गयी |
भार्गवजी ने देखकर पास किया | छपाई के काम में हाथ लगा |... उसी समय प्रेमचंदजी का
शुभागमन हुआ |” (प्रेमचंद पत्रों में, पृ. २०)
यहाँ इटालिक्स में छपे अंश पर ध्यान देने पर कई बातें ज्ञात होती हैं |
(१) संशोधन वाली कापी ‘प्रेस-कापी’ थी जो संभवतः पांडुलिपि से भिन्न थी, क्योंकि
‘प्रेस-कापी’ को कम्पोज़िटरों के हाथ में देना होता था, जिससे उनके गंदे होने-फटने
का खतरा होता था | पांडुलिपि पर संशोधन नहीं करना पड़ता था – ऐसी शायद दुलारेलाल की
हिदायत रहती होगी | शिवजी के संस्मरण में
उल्लिखित ‘रंगभूमि’ की उस मूल पांडुलिपि की तलाश मैनें भी और गोयनकाजी ने बहुत की
थी पर वह कहीं मिल नहीं सकी | बहरहाल, उन्हीं दिनों ‘माधुरी’ में प्रकाशित
प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘शतरंज के
खिलाड़ी’ की मूल पांडुलिपि गोयनकाजी को मिल गयी थी और उन्होंने लोठार लुत्से के साथ
लिखी अपनी पुस्तक ‘प्रेमचंद और शतरंज के खिलाड़ी’ (१९८०) में उसकी छाया-प्रति
प्रकाशित कर दी थी | लेकिन ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की उस मूल पांडुलिपि पर सम्पादन-संशोधन
का कहीं कोई चिन्ह नहीं है | इस प्रसंग में यहाँ यह पहली बार विशेष रूप से
उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज
के खिलाड़ी’ का प्रकाशन उसी समय ‘माधुरी’ (अक्टूबर. १९२४) में हुआ था, जब “पत्रिका
के अतिरिक्त कुछ पुस्तकों के संशोधन का काम “दुलारेलाल ने शिवजी को दिया था |
इसलिए आगमिक-तर्क पद्धति के अनुसार निश्चय ही ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का संशोधन भी
उन्हीं दिनों (सितम्बर, १९२४ में) शिवपूजन सहाय का ही किया हुआ था | वस्तुतः, ऐसा
सूक्ष्म संशोधन-कार्य दुलारेलाल की क्षमता-सीमा में किसी प्रकार हो भी नहीं सकता
था, यद्यपि गोयनकाजी ने पाठ-शोध वाली अपनी उस पुस्तक में इस कहानी के संशोधन-कार्य
का श्रेय, इन सभी प्रमाणों के होते हुए भी, शिवपूजन सहाय को नहीं दिया है, बल्कि
दुलारेलाल को ही दिया है | दुलारेलाल भाषा-सम्पादन के आग्रही और पारखी ज़रूर थे, पर
संपादन-कला के आचार्य तो शिवपूजन सहाय ही थे, और इसीलिए दुलारेलाल शिवपूजन सहाय को
कलकत्ता से लखनऊ बुलाने को व्यग्र रहे थे | अब यदि, ‘रंगभूमि’ की मूल पाण्डुलिपि
की अनुपस्थिति में, और ‘शतरंज के खिलाडी’ कहानी की मूल पांडुलिपि की उपलब्धता की
स्थिति में, उपर्युक्त तथ्यों के अलोक में, आगमिक-तर्क के अनुसार, यह मान लें
कि‘रंगभूमि’ के साथ-साथ, उन्हीं दिनों, शिवपूजन सहाय ने ‘शतरंज के खिलाडी’ कहानी
का भी निश्चय ही सम्पादन-संशोधन किया था, और यह बारीक, कलात्मक काम दुलारेलाल से
संभव नहीं था (क्योंकि शिवजी के संग्रह में दुलारेलाल के १३५ पत्रों की भाषा को
देखने से ऐसा मानना बिलकुल संभव नहीं है, और फिर दुलारेलाल यह काम स्वयं क्यों
करते जब उन्होंने शिवजी को इसी काम के लिए अपने सम्पादकीय-विभाग में विशेष रूप से
कलकत्ता से बुला कर रखा था) – तब, वैसी स्थिति में, गोयनका जी की पाठ-शोध की
पुस्तक ‘प्रेमचंद और शतरंज के खिलाडी’ में सम्पादन-संशोधन के विषय में विचारित सभी
निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से शिवपूजन सहाय के सम्पादन-कौशल से जुड़ जाते हैं | और तब
उस स्थिति में, ‘रंगभूमि’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ – दोनों के प्रथम मुद्रित पाठों को
आमने सामने रख कर, उन दोनों के गद्य-लेखन पर तुलनात्मक दृष्टि से विचार करते हुए हम यह
विश्लेषित कर सकते हैं कि प्रेमचंद के कथा-गद्य को हिंदी का संस्कार और परिमार्जन
देने में शिवपूजन सहाय का योगदान कैसा और किस हद तक का था |
गोयनका जी ने पाठ-शोध की अपनी पुस्तक में प्रेमचंद के गद्य-प्रयोग और उसमें सम्पादकीय संशोधनात्मक हस्तक्षेप का जो विश्लेषण
किया है, और उससे जो निष्कर्ष निकाले हैं, उन सब से सहमत होना अनिवार्य नहीं है,
किन्तु वे पर्याप्त मार्ग-दर्शक हैं, इसमें कोई संदेह नहीं | उसमें यदि, ऊपर
उल्लिखित तथ्यों के आलोक में हम इतना जोड़ लें कि ‘रंगभूमि’ के साथ-साथ ‘शतरंज के
खिलाड़ी’ का संशोधन-कार्य भी शिवपूजन सहाय ने ही किया था, तब हम यह कह सकते हैं की
प्रेमचंद की कथा-भाषा के विकास में शिवपूजन सहाय के भाषा-आचार्यत्व की एक
महत्त्वपूर्ण भूमिका थी |
भाषा-विज्ञानं मेरा भी विषय रहा है, और पाठ-शोध के
शास्त्रीय पक्ष से मेरा भी थोडा परिचय रहा है | और यही कारण है कि लम्बे समय
से मैं श्रीगोयनका के प्रेमचंद-सम्बन्धी
शोध-कार्य का बहुत गंभीर प्रशंसक और पाठक भी रहा हूँ | साहित्य में शैली का विकास,
गद्य और पद्य दोनों में ही, भाषा-विज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण विषय रहा है, और
मुझको लगता है प्रेमचंद के कथा-साहित्य का समाज-शास्त्रीय अथवा शिल्प-पक्षीय
विवेचन समालोचना की मुख्यधारा का एक
अग्रगण्य पक्ष अवश्य रहा है, परन्तु हिंदी कथा-साहित्य के भाषा-पक्ष के विकास में
प्रेमचंद की कथा-भाषा का योगदान कैसा रहा है, और उसमें उनके अभिन्न सखा (स्वयं एक
सफल कथाकार) भाषा-आचार्य शिवपूजन सहाय की कितनी और कैसी सहभागिता रही है, इस दिशा
में अभी पर्याप्त शोध की संभावनाएं शेष हैं |
गोयनकाजी को लेकर साहित्यालोचन में राजनीतिक पक्षधरता का एक
लम्बा और उलझा हुआ विवाद है, जो बहुत गहराई में डा. रामविलास शर्मा और कई और लोगों
से जुडा रहा है, लेकिन उसमें फिलवक्त मेरी कोई अभिरुचि नहीं है | संभव है उनके विपक्ष
और विरोध में जितनी बातें अब तक सामने आती रही हैं, उनमें बहुत दम भी हो, यद्यपि
मेरा यह दावा बिलकुल नहीं है कि मैं उन विवादों से पूरी तरह परिचित, प्रभावित या
अप्रभावित रहा हूँ | किन्तु मैं, उनके और अपने इस सुदीर्घ साहित्यिक साहचर्य को,
और प्रेमचंद के बहाने उनके विपुल साहित्यिक शोध-कार्य को, बहुत मूल्यवान मानते हुए, अपनी व्यक्तिगत
अभिरुचियों और अपने संस्कारित साहित्यिक प्रतिबद्धताओं के साथ, सदा उनके साथ खड़ा
रहा हूँ, यह मेरे लिए परम संतोष का विषय है | मेरा और गोयनकाजी का यह साथ
साहित्य-पथ पर चलने वाले दो सह-यात्रियों का साथ है, जिनकी साहित्य-दृष्टि भी एक
ही हो यह महत्त्वपूर्ण नहीं है | महत्त्वपूर्ण है तो हमारे बीच का यह परस्पर
सह-यात्रा-भाव और सौहार्द !
आलेख (C) डा. मंगलमूर्त्ति